पदार्थान्वयभाषाः - [१] (नदीनाम्) = [नदिः - स्तोता ] स्तोताओं के (चरणे) = चरण में (सस्त्रिम्) = उस शुद्ध करनेवाले प्रभु को (अविन्दत्) = प्राप्त करता है। स्तोताओं के समीप विनीतता से बैठकर, प्रभु की चर्चा करने पर हम भी प्रभु का कुछ आभास पानेवाले बनते हैं। इस प्रभु की ओर झुकाव के कारण हमारे जीवन शुद्ध होते हैं। वे प्रभु 'सस्त्रि' हैं, हमारे जीवनों को स्नात कर देते हैं। जैसे स्नान से सब स्वेदमल दूर हो जाता है, इसी प्रकार प्रभु ध्यान में स्नान करने से वासनारूप मल धुल जाते हैं [२] यह (अश्मव्रजानाम्) = [अश्माभवतु न स्तनूः] पाषाणतुल्य दृढ़ शरीररूप बाड़ेवाली, अर्थात् इधर-उधर न भटककर शरीर में स्थित होनेवाली इन्द्रियों के (दुर:) = द्वारों को (अपावृणोत्) = अपावृत करता है । उनको अपने वश में करता हुआ उन्हें अपने-अपने कार्यों में सुचारुरूपेण प्रवृत्त करता है। कर्मेन्द्रियों के द्वारा इसमें शक्ति का वर्धन होता है, तो ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा यह ज्ञान का वर्धन करनेवाला बनता है। [३] यह व्यक्ति (गन्धर्वः) = ज्ञान की वाणियों का धारण करनेवाला बनता हुआ (आसाम्) = इन वेदवाणियों के अमृतानि अमृत वचनों का (प्रवोचत्) = प्रकर्षेण उच्चारण करता है। यह इस उच्चारण को इसलिए करता है कि यह (इन्द्रः) = जितेन्द्रिय पुरुष (अहीनाम्) = [आहन्ति] इन आक्रमण करनेवाली वासनाओं के (दक्षम्) = बल को (परिजानात्) = अच्छी प्रकार जानता है। इनके प्रबल आक्रमण से बचने के लिए ज्ञान की वाणियों का उच्चारण आवश्यक ही है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हमें उपासकों का सम्पर्क प्राप्त हो । इन्द्रियों को अपने वश में करके इनको हम स्वकार्यरत रखें। वेदवाणियों का उच्चारण करें और वासनाओं के आक्रमण से बचें। सूक्त का मूलभाव यही है कि हम शक्ति व ज्ञान का संचय करते हुए इस संसार में आसक्त न हों। प्रभु का उपासन करते हुए अपने जीवनों को पवित्र बनाएँ। यह अपने को पवित्र बनानेवाला ही 'पावक:' है, उन्नतिपथ पर चलने के कारण 'अग्निः ' है । इसकी प्रार्थना का स्वरूप यह है-