पदार्थान्वयभाषाः - [१] (विश्वावसुः) = सम्पूर्ण वसुओं के स्वामी प्रभु (नः) = हमारे लिए (तत्) = उस ज्ञान को (अभिगृणातु) = पर व अपर दोनों रूप में उपदिष्ट करें, हमारे लिये अपरा व परा दोनों विद्याओं का ही ज्ञान दें। प्रभु कृपा से हमें प्रकृति के ज्ञान के साथ आत्मज्ञान भी प्राप्त हो। वे प्रभु जो कि (दिव्यः) = सदा अपने प्रकाशमय स्वरूप में होनेवाले हैं। (गन्धर्वः) = ज्ञान की वाणियों का धारण करनेवाले हैं। (रजसः विमानः) = रजोगुण का विशेषरूप से हमारे में निर्माण करनेवाले हैं, जिस रजोगुण के विशिष्ट निर्माण से हम अकाम भी नहीं होते और कामात्मा भी नहीं बन जाते । [२] (यद् वा घा) = जो प्रभु निश्चय से (सत्यम्) = सत्य हैं, त्रिकालाबाधित सत्तावाले हैं, (उत) = परन्तु (यत् न विद्म) = जिन्हें हम जानते नहीं, जो पूर्णरूप से हमारे ज्ञान का विषय नहीं बनते, वे प्रभु (धियः हिन्वानः) = हमारी बुद्धियों को प्रेरित करते हैं । हे प्रभो ! आप (नः धियः) = हमारी बुद्धियों का (इत् अव्याः) = निश्चय से रक्षण करिये। इन बुद्धियों के रक्षित होने पर ही हमारे कर्म भी उत्तम हो सकेंगे।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-वे सत्य व अज्ञेय प्रभु हमें ज्ञान दें। वे प्रभु हमारी बुद्धियों का रक्षण करें।