वांछित मन्त्र चुनें

वि॒श्वाव॑सुर॒भि तन्नो॑ गृणातु दि॒व्यो ग॑न्ध॒र्वो रज॑सो वि॒मान॑: । यद्वा॑ घा स॒त्यमु॒त यन्न वि॒द्म धियो॑ हिन्वा॒नो धिय॒ इन्नो॑ अव्याः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

viśvāvasur abhi tan no gṛṇātu divyo gandharvo rajaso vimānaḥ | yad vā ghā satyam uta yan na vidma dhiyo hinvāno dhiya in no avyāḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

वि॒श्वऽव॑सुः । अ॒भि । तत् । नः॒ । गृ॒णा॒तु॒ । दि॒व्यः । ग॒न्ध॒र्वः । रज॑सः । वि॒ऽमानः । यत् । वा॒ । घ॒ । स॒त्यम् । उ॒त । यत् । न । वि॒द्म । धियः॑ । हि॒न्वा॒नः । धियः॑ । इत् । नः॒ । अ॒व्याः॒ ॥ १०.१३९.५

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:139» मन्त्र:5 | अष्टक:8» अध्याय:7» वर्ग:27» मन्त्र:5 | मण्डल:10» अनुवाक:11» मन्त्र:5


0 बार पढ़ा गया

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (विश्वावसुः) विश्व को बसानेवाला या विश्व में बसनेवाला (दिव्यः) मोक्षधाम का अधिपति (गन्धर्वः) वेदवाणी का धारक (रजसः-विमानः) लोकमात्र का निर्माणकर्ता परमात्मा (नः) हमें (तत्) उसका (अभि गृणातु) उपदेश करे (यत्-वा-घ-सत्यम्) जो कि सत्य ज्ञान हो (यत्-न विद्मः) जिसको हम न जानें (धियः-हिन्वानः) बुद्धियों को प्रेरित करता हुआ (नः-धियः-इत्-अव्याः) वह तू हमारी बुद्धियों की रक्षा कर ॥५॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा विश्व को बसानेवाला मोक्षधाम का अधिपति, वेदवाणी का धारण करनेवाला, लोकमात्र का निर्माणकर्ता है, उससे सत्य ज्ञान व जिस बात को हम न जानते हों, उस बात का उपदेश लेने और बुद्धि की रक्षा करने की प्रार्थना करनी चाहिये ॥५॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सत्य परन्तु अज्ञेय

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (विश्वावसुः) = सम्पूर्ण वसुओं के स्वामी प्रभु (नः) = हमारे लिए (तत्) = उस ज्ञान को (अभिगृणातु) = पर व अपर दोनों रूप में उपदिष्ट करें, हमारे लिये अपरा व परा दोनों विद्याओं का ही ज्ञान दें। प्रभु कृपा से हमें प्रकृति के ज्ञान के साथ आत्मज्ञान भी प्राप्त हो। वे प्रभु जो कि (दिव्यः) = सदा अपने प्रकाशमय स्वरूप में होनेवाले हैं। (गन्धर्वः) = ज्ञान की वाणियों का धारण करनेवाले हैं। (रजसः विमानः) = रजोगुण का विशेषरूप से हमारे में निर्माण करनेवाले हैं, जिस रजोगुण के विशिष्ट निर्माण से हम अकाम भी नहीं होते और कामात्मा भी नहीं बन जाते । [२] (यद् वा घा) = जो प्रभु निश्चय से (सत्यम्) = सत्य हैं, त्रिकालाबाधित सत्तावाले हैं, (उत) = परन्तु (यत् न विद्म) = जिन्हें हम जानते नहीं, जो पूर्णरूप से हमारे ज्ञान का विषय नहीं बनते, वे प्रभु (धियः हिन्वानः) = हमारी बुद्धियों को प्रेरित करते हैं । हे प्रभो ! आप (नः धियः) = हमारी बुद्धियों का (इत् अव्याः) = निश्चय से रक्षण करिये। इन बुद्धियों के रक्षित होने पर ही हमारे कर्म भी उत्तम हो सकेंगे।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-वे सत्य व अज्ञेय प्रभु हमें ज्ञान दें। वे प्रभु हमारी बुद्धियों का रक्षण करें।
0 बार पढ़ा गया

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (विश्वावसुः-दिव्यः) विश्ववासको मोक्षधामाधिपतिः (गन्धर्वः-रजसः-विमानः) वेदवाचो धारयिता, लोकस्य निर्माता (नः-तत्-अभि-गृणातु) अस्मान् तदुपदिशतु (यत्-वा घ सत्यम्) यच्च खलु-सत्यज्ञानं (यत्-न विद्म) यद्वयं न जानीमः (धियः-हिन्वानः) बुद्धीः प्रेरयन् (नः-धियः-इत्-अव्याः) स त्वमस्माकं बुद्धीः रक्षेः ॥५॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - May the spirit of the universe, shelter home of the world and world’s wealth and knowledge, divine sustainer of the universe and universal wisdom, maker and measurer of the universe in space and time, enlighten us of what is the truth of existence, what we do not know. May he inspire our vision and intelligence, and protect and promote our intelligence, will and actions.