धन हमारे हों, नकि हम धनों के
पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत मन्त्र का ‘नृचक्षाः' (रायः बुध्नः) = ऐश्वर्य का आधार बनता है। इसे प्रभु की ओर से सब आवश्यक ऐश्वर्य प्राप्त होते हैं । (वसूनां संगमन:) = यह सब वसुओं के एकत्रित होने का स्थान बनता है । इसे सब वसु प्राप्त होते हैं । यह (शचीभिः) = अपने प्रज्ञानों से (विश्वारूपा) = सब रूपों का, (रूपवान्) = पदार्थों का (अभिचष्टे) = निरीक्षण करता है। उन चीजों के तत्त्व को समझकर उन पदार्थों का ठीक प्रयोग करता है। इस उचित प्रयोग से यह स्वस्थ रहता है और उन चीजों के अन्दर कभी उलझना नहीं। 'तत्त्वज्ञान' ठीक प्रयोग तथा अनासक्ति के भाव को जगाता है। [२] यह व्यक्ति (देव इव) = उस प्रकाशमय प्रभु की तरह ही (सविता) = निर्माण को करनेवाला होता है। (सत्यधर्मा) = यह सत्य को धारण करता है और (इन्द्रः न) = जितेन्द्रिय के समान (धनानां समरे तस्थौ) = धनों के युद्ध में स्थित होता है । istruggle के द्वारा धनों का विजय करता है, धनों में कभी भी फँसता नहीं । धनों का ही नहीं हो जाता, धनों का गुलाम नहीं बनता ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-तत्त्वदर्शन से हम संसार के पदार्थों में फँसने से बचे रहते हैं। देव की तरह निर्माण परन्तु उन करनेवाले व सत्य का धारण करनेवाले होते हैं और इन्द्र की तरह धनों का विजय करते हैं । धन हमारे होते हैं, हम धनों के नहीं हो जाते।