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रा॒यो बु॒ध्नः सं॒गम॑नो॒ वसू॑नां॒ विश्वा॑ रू॒पाभि च॑ष्टे॒ शची॑भिः । दे॒व इ॑व सवि॒ता स॒त्यध॒र्मेन्द्रो॒ न त॑स्थौ सम॒रे धना॑नाम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

rāyo budhnaḥ saṁgamano vasūnāṁ viśvā rūpābhi caṣṭe śacībhiḥ | deva iva savitā satyadharmendro na tasthau samare dhanānām ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

रा॒यः॑ । बु॒ध्नः । स॒म्ऽगम॑नः । वसू॑नाम् । विश्वा॑ । रू॒पा । अ॒भि । च॒ष्टे॒ । शची॑भिः । दे॒वःऽइ॑व । स॒वि॒ता । स॒त्यऽध॑र्मा । इन्द्रः॑ । न । त॒स्थौ॒ । स॒म्ऽअ॒रे । धना॑नाम् ॥ १०.१३९.३

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:139» मन्त्र:3 | अष्टक:8» अध्याय:7» वर्ग:27» मन्त्र:3 | मण्डल:10» अनुवाक:11» मन्त्र:3


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (रायः-बुध्नः) ज्ञानधन का बोध करानेवाला परमात्मा तथा प्रकाश से बोध करानेवाला सूर्य (वसूनां सङ्गमनः) प्राणों की संगति करानेवाला (विश्वा रूपा) सब निरूपणीय वस्तुओं को (शचीभिः-अभिचष्टे) वेदवाणियों से प्रकाशित करनेवाला या कर्मों के द्वारा प्रकाशित करनेवाला (देवः-इव सविता सत्यधर्मा) सविता देव सत्यज्ञानवाला परमात्मा या सत्यनियमवाला सूर्य (इन्द्रः-न-धनानाम्) राजा की भाँति धनों का (समरे तस्थौ) सम्प्रापण संग्रह में स्थित है ॥३॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा वेदवाणियों के ज्ञान का दाता सत्यगुणकर्मस्वभाववाला समस्त निरूपणीय वस्तुओं का देनेवाला और प्राणदाता है एवं सूर्य अपने प्रकाश से वस्तुओं का दिखानेवाला प्राणसंचार करानेवाला है, समस्त रूपवाली वस्तुओं का बतानेवाला है, उससे लाभ लेना चाहिये ॥३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

धन हमारे हों, नकि हम धनों के

पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत मन्त्र का ‘नृचक्षाः' (रायः बुध्नः) = ऐश्वर्य का आधार बनता है। इसे प्रभु की ओर से सब आवश्यक ऐश्वर्य प्राप्त होते हैं । (वसूनां संगमन:) = यह सब वसुओं के एकत्रित होने का स्थान बनता है । इसे सब वसु प्राप्त होते हैं । यह (शचीभिः) = अपने प्रज्ञानों से (विश्वारूपा) = सब रूपों का, (रूपवान्) = पदार्थों का (अभिचष्टे) = निरीक्षण करता है। उन चीजों के तत्त्व को समझकर उन पदार्थों का ठीक प्रयोग करता है। इस उचित प्रयोग से यह स्वस्थ रहता है और उन चीजों के अन्दर कभी उलझना नहीं। 'तत्त्वज्ञान' ठीक प्रयोग तथा अनासक्ति के भाव को जगाता है। [२] यह व्यक्ति (देव इव) = उस प्रकाशमय प्रभु की तरह ही (सविता) = निर्माण को करनेवाला होता है। (सत्यधर्मा) = यह सत्य को धारण करता है और (इन्द्रः न) = जितेन्द्रिय के समान (धनानां समरे तस्थौ) = धनों के युद्ध में स्थित होता है । istruggle के द्वारा धनों का विजय करता है, धनों में कभी भी फँसता नहीं । धनों का ही नहीं हो जाता, धनों का गुलाम नहीं बनता ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-तत्त्वदर्शन से हम संसार के पदार्थों में फँसने से बचे रहते हैं। देव की तरह निर्माण परन्तु उन करनेवाले व सत्य का धारण करनेवाले होते हैं और इन्द्र की तरह धनों का विजय करते हैं । धन हमारे होते हैं, हम धनों के नहीं हो जाते।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (रायः-बुध्नः) ज्ञानधनस्य “बोधधनस्य” [यजु० ७।१४ दयानन्दः] बोधयिता “बुध्नः-यो बोधयति सर्वान् पदार्थान् वेदद्वारा सः” [ऋ० १।९६।६ दयानन्दः] परमात्मा तथा प्रकाशेन बोधयिताऽऽदित्यः (वसूनां सङ्गमनः) प्राणानां सङ्गमयिता “प्राणा-वै वसवः” [तै० ३।२।३।३] विश्वा रूपा शचीभिः-अभिचष्टे) विश्वानि सर्वाणि निरूपणीयानि वस्तूनि वेदवाग्भिरभिप्रकाशयति “शची वाङ्नाम” [निघ० १।११] कर्मभिर्वा “शची कर्मनाम” [निघ० २।१] (देवः-इव-सविता सत्यधर्मा) देवः सविता “इवोऽपि दृश्यते-पदपूरणः” [निरु० १।१०] परमात्मा तथा सूर्यः सत्यनियमवान्-अस्ति (इन्द्रः-न धनानां समरे तस्थौ) राजेव धनानां सम्प्रापणे स्थितः-तिष्ठति वा ॥३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - The very root and foundation of wealth, power and excellence, giver of health, peace, comfort and security of life, Savita watches, illuminates and inspires every thing of life with its forms and powers of action. Like omnificent divinity itself, the very essence and spirit of truth and Dharma, Savita abides by us in our battles for life’s wealth, beauty and excellence.