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नृ॒चक्षा॑ ए॒ष दि॒वो मध्य॑ आस्त आपप्रि॒वान्रोद॑सी अ॒न्तरि॑क्षम् । स वि॒श्वाची॑र॒भि च॑ष्टे घृ॒ताची॑रन्त॒रा पूर्व॒मप॑रं च के॒तुम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

nṛcakṣā eṣa divo madhya āsta āpaprivān rodasī antarikṣam | sa viśvācīr abhi caṣṭe ghṛtācīr antarā pūrvam aparaṁ ca ketum ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

नृ॒ऽचक्षाः॑ । ए॒षः । दि॒वः । मध्ये॑ । आ॒स्ते॒ । आ॒प॒प्रि॒ऽवान् । रोद॑सी॒ इति॑ । अ॒न्तरि॑क्षम् । सः । वि॒श्वाचीः॑ । अ॒भि । च॒ष्टि॒ । घृ॒ताचीः॑ । अ॒न्त॒रा । पूर्व॑म् । अप॑रम् । च॒ । के॒तुम् ॥ १०.१३९.२

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:139» मन्त्र:2 | अष्टक:8» अध्याय:7» वर्ग:27» मन्त्र:2 | मण्डल:10» अनुवाक:11» मन्त्र:2


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (नृचक्षाः) कर्म के नेता मनुष्यों का द्रष्टा साक्षी परमात्मा या मनुष्यों द्वारा देखा जानेवाला सूर्य (एषः) यह (दिवः-मध्ये-अस्ति) ज्ञानानन्दमय मोक्ष में वर्तमान है या द्युलोक में रहता है (रोदसी-अन्तरिक्षम्) द्युलोक और अन्तरिक्षलोक को (आपप्रिवान्) पूर्ण करता है (सः) वह (विश्वाचीः-अभिचष्टे) सब दिशाओं को प्रकाशित करता है (पूर्वम्-अपरम्-अन्तरा केतुम्) पूर्व पश्चिम दिशा को और दोनों के मध्य में अन्तराल में होनेवाले केतु-केतनीय-सङ्केत में आनेवाले प्रदेश को भी प्रकाशित करता है ॥२॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा कर्म करनेवाले मनुष्यों का द्रष्टा या साक्षी है, ज्ञानानन्दमय मोक्ष में प्राप्त होता है, द्युलोक पृथिवीलोक अन्तरिक्ष में भरा हुआ है-व्याप्त है, सारी दिशाओं को प्रकाशित करता है एवं सूर्य मनुष्यों के द्वारा देखा जानेवाला द्युलोक में वर्तमान तीनों लोकों को प्रकाश से भरनेवाला सब दिशाओं को प्रकाशित करता है ॥२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अपरा और पराविद्या

पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत मन्त्र के अनुसार (नृचक्षाः) = सब मनुष्यों का ध्यान करनेवाला यह उपासक (दिवः मध्ये) = ज्ञान के मध्य में (आस्ते) = निवास करता है, अर्थात् सतत स्वाध्याय में लगा हुआ यह ज्ञान प्रधान जीवन बिताता है। यह (रोदसी) = द्यावापृथिवी को, मस्तिष्क व शरीर को तथा (अन्तरिक्षम्) = हृदयान्तरिक्ष को आपप्रिवान् पूरित करनेवाला होता है। यह मस्तिष्क को ज्ञान से, शरीर को शक्ति से तथा हृदय को श्रद्धा व भक्ति से भरने का प्रयत्न करता है। [२] (सः) = वह (विश्वाची:) = [अञ्च्=गति=ज्ञान] विश्व का ज्ञान देनेवाली प्रकृति विद्या को तथा (घृताची:) = [घृत-ज्ञानदीप्त आत्मा] ज्ञानपुञ्ज देदीप्यमान प्रभु का ज्ञान देनेवाली आत्मविद्या को अभिचष्टे सम्यक्तया देखता है । इस प्रकार यह पूर्वं केतुम् उत्कृष्ट आत्मज्ञान के तथा (अपरं च केतुम्) = अपर प्रकृति ज्ञान के (अन्तरा) = बीच में रहता है। अपराविद्या तथा पराविद्या दोनों का ज्ञान प्राप्त करता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-लोकहित की प्रवृत्तिवाला व्यक्ति अपराविद्या के ज्ञान से सांसारिक ऐश्वर्य को प्राप्त करता है और पराविद्या के द्वारा यह उस ऐश्वर्य में न फँसकर उसका लोकहित के लिए ही विनियोग करता है।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (नृचक्षाः) कर्मनेतॄणां मनुष्याणां द्रष्टा साक्षी परमात्मा यद्वा नृभिर्जनैर्दृश्यमान आदित्यः (एषः) एष खलु (दिवः-मध्ये-आस्ते) ज्ञानानन्दमये मोक्षे वर्तते प्राप्यते यद्वा द्युलोके तिष्ठति वर्तते (रोदसी-अन्तरिक्षम्-आपप्रिवान्) द्यावापृथिव्यौ-अन्तरिक्षं च पूरयति “प्रा पूरणे” [अदादि०] “लिटि क्वसुः” (सः) स खलु (विश्वाचीः-अभिचष्टे) विश्वमञ्चन्तीः-दिशोऽभिप्रकाशयति (पूर्वम्-अपरम्-अन्तरा केतुम्) पूर्वं पश्चिमं तयोरन्तरालं केतुं केतनीयं-सङ्केतनीयं प्रदेशं चाभिप्रकाशयति ॥२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Watching and enlightening humanity, this light divine of life abides in the midst of heaven, filling heaven, earth and the middle region with its light and glory. It illuminates all quarters of space with universal light and bliss before and after and everywhere in between over the planets and the node.