सूर्य॑रश्मि॒र्हरि॑केशः पु॒रस्ता॑त्सवि॒ता ज्योति॒रुद॑याँ॒ अज॑स्रम् । तस्य॑ पू॒षा प्र॑स॒वे या॑ति वि॒द्वान्त्स॒म्पश्य॒न्विश्वा॒ भुव॑नानि गो॒पाः ॥
sūryaraśmir harikeśaḥ purastāt savitā jyotir ud ayām̐ ajasram | tasya pūṣā prasave yāti vidvān sampaśyan viśvā bhuvanāni gopāḥ ||
स॒ूर्य॑ऽरश्मिः । हरि॑ऽकेशः । पु॒रस्ता॑त् । स॒वि॒ता । ज्योतिः॑ । उत् । अ॒या॒न् । अज॑स्रम् । तस्य॑ । पू॒षा । प्र॒ऽस॒वे । या॒ति । वि॒द्वान् । स॒म्ऽपश्य॑न् । विश्वा॑ । भुव॑नानि । गो॒पाः ॥ १०.१३९.१
ब्रह्ममुनि
इस सूक्त में परमात्मा सब लोकों में व्याप्त है, सबको जानता है, सबकी कामनाएँ पूरी करता है, सूर्य सबको प्रकाशित करता है, इत्यादि विषय हैं।
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
[१] (सूर्यरश्मिः) = सूर्य के समान ज्ञान की रश्मियोंवाला, (हरिकेशः) = दुःख के हरण करनेवाली ज्ञानरश्मियोंवाला [हरणात्, केश= ray of light] (सविता) = निर्माण के कार्यों में लगा हुआ, (ज्योतिः) = प्रकाशमय जीवनवाला (अजस्त्रम्) = निरन्तर (पुरस्तात्) = आगे और आगे (उत् अयात्) = उत्कृष्ट गतिवाला होता है । [२] यह (पूषा) = अपनी शक्तियों का पोषण करनेवाला विद्वान् ज्ञानी पुरुष (तस्य प्रसवे) = उस परमात्मा की अनुज्ञा में (याति) = गति करता है। प्रभु के आदेशों के अनुसार क्रियावाला होता है । यह (विश्वा भुवनानि संपश्यन्) = सब प्राणियों को देखता हुआ गति करता है, अर्थात् सबके भले का ध्यान करता हुआ चलता है, केवल अपने ही स्वार्थ को नहीं देखता । गोपाः = यह अपनी इन्द्रियों का रक्षण करनेवाला होता है । जितेन्द्रिय बनकर ही तो यह ठीक मार्ग पर चल पाता है।
ब्रह्ममुनि
अस्मिन् सूक्ते परमात्मा सर्वान् लोकान् व्याप्नोति सर्वान् जानाति च सर्वेषां कामान् पूरयति, सूर्यः सर्वान् प्रकाशयति प्रेरयति चेत्येवमादयो विषयाः सन्ति।
