प्रभु के तीन महत्त्वपूर्ण कार्य
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे प्रभो ! (एता) = ये (त्या) = वे (ते) = आपके श्रुत्यानि अत्यन्त प्रसिद्ध कर्म हैं । केवला ये कर्म आपके ही हैं, दूसरे की शक्ति से होनेवाले ये कर्म नहीं। प्रथम तो यह (यत्) = कि (एकः) = अकेले ही आप (एकम्) = इस अद्वितीय शक्तिशाली (अयज्ञम्) = यज्ञ की भावना से शून्य आसुरभाव को [= वासना को ] (अकृणोः) = हिंसित करते हैं । प्रभु कृपा से ही कामवासना नष्ट होती है, वह कामवासना जो कि अत्यन्त प्रबल है तथा यज्ञादि सब उत्तम कर्मों को नष्ट करनेवाली है [महाशन: महापाप्मा] । [२] आप (अधिद्यवि) = हमारे मस्तिष्क रूप द्युलोक में उस ज्ञान सूर्य को (अदधाः) = स्थापित करते हैं जो कि (मासाम्) = ameesheenents का, माप-तोल का (विधानम्) = करनेवाला है । अर्थात् आप उस ज्ञान को देते हैं जिससे कि हम सब कार्यों को माप-तोलकर करनेवाले होते हैं। [३] (त्वया) = आपकी सहायता से (विभिन्नम्) = टूटी हुई (प्रधिम्) = परिधि व मर्यादा को (पिता) = रक्षण की वृत्तिवाला पुरुष भरति फिर से ठीक कर लेता है। प्रभु का उपासक टूटी हुई मर्यादाओं का पुनः दृढ़ता से पालन करने का ध्यान करता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु के तीन महत्त्वपूर्ण कार्य हैं- [क] प्रबल वासना को दग्ध करना, [ख] ज्ञान को देना जिससे कि हम युक्तचेष्ट बनें, [ग] टूटी हुई मर्यादाओं को फिर से ठीक पालन करने की शक्ति देना । इस प्रकार 'वासनाओं को दग्ध करनेवाला, युक्तचेष्ट, मर्यादित जीवनवाला पुरुष' 'विश्वावसु' बनते हैं, सब तरह से उत्कृष्ट जीवनवाला। यह 'देवगन्धर्व' होता है, दिव्यवृत्तिवाला ज्ञानी। इसका चित्रण करते हुए कहते हैं कि-