पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (कुमार) = क्रीड़क की मनोवृत्ति से चलनेवाले पुरुष ! (यं रथम्) = जिस शरीर - रथ को (विप्रेभ्यः समित) = विशेषरूप से तेरा पूरण करनेवाले [वि-प्रा] माता, पिता व आचार्य आदि से संगत हुए हुए तूने (परि) = चारों ओर (प्रावर्तयः) = तूने गतिमय किया है। माता-पिता व आचार्य के सम्पर्क में आनेवाला व्यक्ति ही अपनी कमियों को दूर करके शरीर रथ को अच्छी प्रकार मार्ग पर ले चलता है । [२] (तम्) = उस (नावि आहितम्) = प्रभु रूप नाव में स्थापित किये हुए रथ को साम (अनु प्रावर्तत) = शान्ति अनुकूलता से प्राप्त होती है। यह रथ प्रभु रूप नाव में आहित होने के कारण इस भवसागर में डूब नहीं जाता। प्रभु नाव बनती है जो इसे विषय जल में डूबने नहीं देती । भाव यह है कि हमारे रथ के संचालक प्रभु हों। इसकी बागडोर प्रभु के हाथ में हो ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - इस शरीर - रथ के संचालन की शिक्षा माता, पिता व आचार्य से प्राप्त होती है। भवसागर से पार करने के लिए इसे प्रभु रूप नाव का सहारा होता है। इस सहारे से ही जीवन की गाड़ी शान्ति से चलती है ।