पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (मन्तुमः) = विचारशील पुरुष ! तू (यथा) = जैसे हि ही (दीर्घं अङ्कुशम्) = दीर्घ अंकुश होता है, उसी अनुपात में शक्ति (बिभर्षि) = शक्ति को धारण करता है। अंकुश हाथी का नियामक है। सो अंकुश शब्द यहाँ नियमन के भाव का सूचक है। जितना नियमन, उतना शक्ति का धारण । इन्द्रियों को वश में करके ही तो शक्ति का रक्षण होता है । [२] हे (मघवन्) = पाप से ऊपर उठने के कारण [मा-अघ] ऐश्वर्यवान् ! (यथा) = जैसे (पूर्वेण पदा) = अगले पाँव से (अजः) = बकरा (वयाम्) = शाखा को पकड़ता है तू भी (पूर्वेण पदा) = प्रथम कदम के हेतु से, अर्थात् शरीर के स्वास्थ्य के हेतु से ही (अजः) = गति के द्वारा बुराइयों को परे फेंकनेवाला वयाम्-संसारवृक्ष की शाखा को ग्रहण करता है। जीव ने तीन कदम रखने होते हैं। प्रथम कदम में वह पृथिवी लोक [शक्ति] को मापता है, दूसरे में अन्तरिक्ष [हृदय] को तथा तीसरे में द्युलोक [मस्तिष्क] को । इन कदमों को रखकर ही यह त्रिविक्रम बनता है । संसारवृक्ष की शाखा के फलों को यह पहले कदम के रखने के हेतु से ग्रहण करता है, अर्थात् स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से ही खाता है। इस प्रकार तू (यमः) = अपना नियन्ता बनता है, अपनी इन्द्रियों, मन, बुद्धि आदि का नियमन करता है। इस नियमन करनेवाले तेरे लिए देवी (जनित्री) = यह व्यवहार साधिका उत्पादिका प्रकृति (अजीजनत्) = प्रभु की महिमा को प्रकट करती है । (भद्रा) = यह कल्याण करनेवाली (जनित्री) = उत्पादिका प्रकृति (अजीजनत्) = प्रभु की महिमा का प्रार्दुभाव करती है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-संयम के अनुपात में हमें शक्ति प्राप्त होती है। संसार का हम उतना ग्रहण करें जितना स्वास्थ्य के लिए आवश्यक हो। इस प्रकार यम- नियन्ता बनने पर हमें सर्वत्र प्रभु की महिमा दिखेगी।