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अव॒ स्वेदा॑ इवा॒भितो॒ विष्व॑क्पतन्तु दि॒द्यव॑: । दूर्वा॑या इव॒ तन्त॑वो॒ व्य१॒॑स्मदे॑तु दुर्म॒तिर्दे॒वी जनि॑त्र्यजीजनद्भ॒द्रा जनि॑त्र्यजीजनत् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ava svedā ivābhito viṣvak patantu didyavaḥ | dūrvāyā iva tantavo vy asmad etu durmatir devī janitry ajījanad bhadrā janitry ajījanat ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अव॑ । स्वेदाः॑ऽइव । अ॒भितः॑ । विष्व॑क् । प॒त॒न्तु॒ । दि॒द्यवः॑ । दूर्वा॑याःऽइव । तन्त॑वः । वि । अ॒स्मत् । ए॒तु॒ । दुः॒ऽम॒तिः । दे॒वी । जनि॑त्री । अ॒जी॒ज॒न॒त् । भ॒द्रा । जनि॑त्री । अ॒जी॒ज॒न॒त् ॥ १०.१३४.५

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:134» मन्त्र:5 | अष्टक:8» अध्याय:7» वर्ग:22» मन्त्र:5 | मण्डल:10» अनुवाक:11» मन्त्र:5


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (दिद्यवः) तीक्ष्ण चमकनेवाले अस्त्रविशेष (स्वेदाः-इव) पसीने के बिन्दुओं के समान (अभितः) शत्रुओं की ओर (विष्वक्) बिखर-बिखर कर (अव पतन्तु) गिरें (दुर्मतिः) दुष्ट शत्रु (दूर्वायाः-तन्तवः-इव) दूर्वा घास के तन्तुओं की भाँति (अस्मत्) हम से (वि-एतु) विच्छिन्न हो जावें (देवी०) पूर्ववत् ॥५॥
भावार्थभाषाः - तीक्ष्ण शस्त्र शत्रुओं के प्रति बरसाने चाहिए, जिससे कि शत्रु छिन्न-भिन्न होकर नष्ट हो जावें ॥५॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सुमति से दर्शनीय प्रभु

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (इव) = जैसे (स्वेदा:) = स्वेदकण (अभितः) = चारों ओर (अव) [पतन्ति] = दूर गिर जाते हैं इसी प्रकार (दिद्यवः) = प्रभु के खण्डन करनेवाले अस्त्र हमारे से (विश्वक्) = चारों ओर [अव] (पतन्तु) = दूर ही गिरें। इन अस्त्रों का हमारे पर प्रहार न हो, अर्थात् हम दण्डभागी न बनें। [२] इस दण्ड के भागी न बनने के लिए ही (दूर्वायाः तन्तवः इव) = दूर्वा के तन्तुओं की तरह (अस्मत्) = हमारे से (दुर्मतिः) = दुष्ट बुद्धि (वि एतु) = दूर हो। दुष्ट बुद्धि के न होने पर आचरण भी पवित्र होगा । पवित्राचरण के होने पर हम दण्डभागी न होंगे। [३] इस पवित्राचरण के होने पर (देवी) = सब व्यवहारों को सिद्ध करनेवाली यह (जनित्री) = लोक-लोकान्तरों को जन्म देनेवाली प्रकृति (अजीजनत्) = प्रभु की महिमा को प्रकट करती है । (भद्रा) = यह कल्याण करनेवाली (जनित्री) = उत्पादिका प्रकृति (अजीजनत्) = प्रभु का प्रादुर्भाव करती है । उत्तम बुद्धिवाले, प्रकृति के भोगों में न फँसे पुरुष को इन सब प्राकृतिक रचनाओं में प्रभु की रचना चातुरी का दर्शन होता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु के अस्त्र हमारे से इस तरह दूर हों जैसे स्वेद बिन्दु । दुर्मति इस प्रकार दूर हो जैसे घास का तन्तु । इस प्रकार पवित्राचरण होने पर हमें सर्वत्र प्रभु महिमा का दर्शन होगा।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (दिद्यवः) द्योतमानास्त्रविशेषाः (स्वेदाः-इव) गात्रस्वेदबिन्दव इव (अभितः-विष्वक्-अव पतन्तु) शत्रूनभितो विकीर्णीभूय अवपतन्तु (दुर्मतिः) दुर्बुद्धिर्दुष्टः शत्रुः (दूर्वायाः-तन्तवः-इव-अस्मत्-वि-एतु) दूर्वाघासस्य तन्तव इवास्मत्तो विच्छिन्नो भवतु (देवी०) पूर्ववत् ॥५॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Let the blazing warriors of the enemies and their shining weapons fall down all round like particles of mist. Let all hate, enmity and all malignant forces droop and fall like blades of grass. The divine mother exhorts you, the gracious mother exalts you.