पदार्थान्वयभाषाः - [१] (इव) = जैसे (स्वेदा:) = स्वेदकण (अभितः) = चारों ओर (अव) [पतन्ति] = दूर गिर जाते हैं इसी प्रकार (दिद्यवः) = प्रभु के खण्डन करनेवाले अस्त्र हमारे से (विश्वक्) = चारों ओर [अव] (पतन्तु) = दूर ही गिरें। इन अस्त्रों का हमारे पर प्रहार न हो, अर्थात् हम दण्डभागी न बनें। [२] इस दण्ड के भागी न बनने के लिए ही (दूर्वायाः तन्तवः इव) = दूर्वा के तन्तुओं की तरह (अस्मत्) = हमारे से (दुर्मतिः) = दुष्ट बुद्धि (वि एतु) = दूर हो। दुष्ट बुद्धि के न होने पर आचरण भी पवित्र होगा । पवित्राचरण के होने पर हम दण्डभागी न होंगे। [३] इस पवित्राचरण के होने पर (देवी) = सब व्यवहारों को सिद्ध करनेवाली यह (जनित्री) = लोक-लोकान्तरों को जन्म देनेवाली प्रकृति (अजीजनत्) = प्रभु की महिमा को प्रकट करती है । (भद्रा) = यह कल्याण करनेवाली (जनित्री) = उत्पादिका प्रकृति (अजीजनत्) = प्रभु का प्रादुर्भाव करती है । उत्तम बुद्धिवाले, प्रकृति के भोगों में न फँसे पुरुष को इन सब प्राकृतिक रचनाओं में प्रभु की रचना चातुरी का दर्शन होता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु के अस्त्र हमारे से इस तरह दूर हों जैसे स्वेद बिन्दु । दुर्मति इस प्रकार दूर हो जैसे घास का तन्तु । इस प्रकार पवित्राचरण होने पर हमें सर्वत्र प्रभु महिमा का दर्शन होगा।