वांछित मन्त्र चुनें

उ॒भे यदि॑न्द्र॒ रोद॑सी आप॒प्राथो॒षा इ॑व । म॒हान्तं॑ त्वा म॒हीनां॑ स॒म्राजं॑ चर्षणी॒नां दे॒वी जनि॑त्र्यजीजनद्भ॒द्रा जनि॑त्र्यजीजनत् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ubhe yad indra rodasī āpaprāthoṣā iva | mahāntaṁ tvā mahīnāṁ samrājaṁ carṣaṇīnāṁ devī janitry ajījanad bhadrā janitry ajījanat ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

उ॒भे इति॑ । यत् । इ॒न्द्र॒ । रोद॑सी॒ इति॑ । आ॒ऽप॒प्राथ॑ । उ॒षाःऽइ॑व । म॒हान्त॑म् । त्वा॒ । म॒हीना॑म् । स॒म्ऽराज॑म् । च॒र्ष॒णी॒नाम् । दे॒वी । जनि॑त्री । अ॒जी॒ज॒न॒त् । भ॒द्रा । जनि॑त्री । अ॒जी॒ज॒न॒त् ॥ १०.१३४.१

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:134» मन्त्र:1 | अष्टक:8» अध्याय:7» वर्ग:22» मन्त्र:1 | मण्डल:10» अनुवाक:11» मन्त्र:1


0 बार पढ़ा गया

ब्रह्ममुनि

इस सूक्त में राजा संग्राम में कैसे शत्रुओं को ताड़ित करे, शत्रु से धन छीनकर अपनी प्रजाओं में वितरण करे, प्रजा भी स्व सहयोगियों, पुत्रादिकों के सहित राजा की सहायता करे इत्यादि विषय हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्र) हे राजन् ! (यत्) दोनों राज-प्रजाव्यवहारों को अपनी व्याप्ति या से या तेज से (आपप्राथ) पूर्ण करता है (उषाः-इव) प्रातःकालीन प्रभा जैसे आकाश को पूर्ण करती है (महीनां चर्षणीनाम्) महती मनुष्य प्रजाओं के (त्वां महान्तं सम्राजम्) तुझ महान् सम्राट् को (जनित्री देवी) प्रसिद्ध करती है (भद्रा-जनित्री) कल्याणकारिणी राजसभा प्रसिद्ध करती है ॥१॥
भावार्थभाषाः - राजा राजशासन पर विराजकर राज-प्रजाव्यवहारों को पूर्ण करता है, वह राजसभा उसे प्रकाशित-प्रसिद्ध करती है-उसके शासन को चलाती है ॥१॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

निर्माता व शासक प्रभु

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशालिन् प्रभो ! (यत्) = जब (उभे रोदसी) = दोनों द्युलोक व पृथिवीलोक को आप (आपप्राथ) = चारों ओर विस्तृत करते हैं, उसी प्रकार (इव) = जैसे कि (उषा:) = उषाकाल इन्हें विस्तृत करता है । उषा के होते ही, रात्रि में अत्यन्त संकुचित-सा हुआ हुआ यह ब्रह्माण्ड, फिर से अनन्त से विस्तारवाला हो जाता है। इसी प्रकार प्रभु वस्तुतः इस सारे ब्रह्माण्ड को विस्तृत करते हैं । [२] इस विस्तृत द्युलोक व पृथिवीलोक को बनाकर प्रभु ही इसका शासन करते हैं । (महीनाम्) = इन महनीय भूमियों के तथा (चर्षणीनाम्) = इन भूमियों पर निवास करनेवाले प्राणियों के (महान्तं सम्राजम्) = महान् सम्राट् व्यवस्थापक (त्वा) = आपको (देवी) = यह सब व्यवहारों को सिद्ध करनेवाली (जनित्री) = चराचर को जन्म देनेवाली प्रकृति अजीजनत् प्रकट करती है। यह (भद्रा) = कल्याण को करनेवाली व सब सुखों की साधनभूत (जनित्री) = जन्मदात्री प्रकृति (अजीजनत्) = आपकी महिमा का प्रादुर्भाव करती है। प्रकृति से बने इन सब पिण्डों में प्रभु की रचना का कौशल व्यक्त हो रहा है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु इस द्युलोक व पृथिवीलोक को विस्तृत करते हैं। इन लोकों का वे शासन करते हैं। इन लोकों की रचना में प्रभु की रचना चातुरी व्यक्त हो रही है ।
0 बार पढ़ा गया

ब्रह्ममुनि

अस्मिन् सूक्ते राजा सङ्ग्रामे शत्रून् कथं ताडयेदित्युच्यते शत्रुतो धनं प्रहृत्य स्वप्रजाभ्यो विभजेत्, प्रजाजनाश्च स्व सहयोगिभिः पुत्रादिभिश्च सह राज्ञः साहाय्यं दद्युरित्येवमादयो विषयाः सन्ति।

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्र) हे राजन् ! (यत्) यदा (उभे रोदसी-आपप्राथ) उभे द्यावापृथिव्यौ “राजप्रजाव्यवहारौ” [ऋ० ३।३८।८ दयानन्दः] स्वव्याप्त्या तेजसा वा पूरयसि, (उषाः-इव) उषाः प्रातस्तनी प्रभा यथाऽऽकाशं पूरयति (महीनां चर्षणीनां त्वां महान्तं सम्राजम्) महतीनां मनुष्यप्रजानाम् “चर्षणयः-मनुष्यनाम” [निघ० २।३] त्वां महान्तं सम्राजं (जनित्री देवी-अजीजनत्) जनयित्री देवी राजसभा प्रसिद्धं करोति (भद्रा जनित्री-अजीजनत्) कल्याणकारिणी राजसभा प्रसिद्धं करोति ॥१॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, lord of light and glory, ruler of the world, when you fill the earth and the environment with splendour like the dawn, the divine Mother Nature raises you and manifests you as the great ruler of the great people of the world. The gracious mother elevates you in refulgence and majesty as the mighty Indra. (Indra at the cosmic level is the Lord Almighty; at the human level, the world ruler; and at the individual level, Indra is the soul, ruler of the body, senses, mind and intelligence.)