पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (इन्द्र) = राजन् ! (अस्मभ्यम्) = हमारे लिए (त्वम्) = आप (ताम्) = उस गौ को (सु शिक्ष) = अच्छी प्रकार प्राप्त कराइये। (या) = जो गौ (जरित्रे) = स्तोता के लिए (वरम्) = वरणीय वस्तुओं को (प्रतिदोहते) = प्रतिदिन पूरित करती है । यह गौ वेदवाणी है। और यह हमारे लिए 'आयु, प्राण, प्रजा, पशु, कीर्ति, द्रविण व ब्रह्मवर्चस्' आदि सब वरणीय वस्तुओं को प्राप्त कराती है । [२] यह (अच्छिद्रोध्नी) = निर्दोष ऊधस्वाली है । यह पवित्र ज्ञानदुग्ध का ही दोहन करती है। हे राजन् ! ऐसी व्यवस्था करिये (यथा) = जिससे यह (मही गौः) = अत्यन्त महत्त्वपूर्ण वेदवाणी रूप गौ (नः) = हमें (सहस्त्रधारा) = शतशः धारणशक्तियोंवाली होती हुई (पयसा) = अपने ज्ञानदुग्ध से (पीपयत्) = आप्यायित करे ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - राजा का कर्त्तव्य है कि राष्ट्र में सभी को वेदवाणी का ज्ञान प्राप्त कराये । यह वेदवाणी उनका सब प्रकार से वर्धन करेगी। इस सूक्त में राजा का यह मौलिक कर्त्तव्य उल्लिखित हुआ है कि यह शत्रुओं से राष्ट्र का रक्षण करके प्रजाओं को ठीक मार्ग से ले चलता हुआ दुर्गति से बचाये। सभी को वेदवाणी के ज्ञान से युक्त करे। इस वेदवाणी का धारण करनेवाला 'मान्धाता' कहलाता है, क्योंकि यह प्रभु का धारण करता है [मांधाता]। यह 'यौवनाश्व' है, इसके इन्द्रियरूप अश्व अशुभ से पृथक् व शुभ से युक्त होते हैं। वह वेदवाणी का धारण करने से 'गो-धा' भी कहलाता है। अग्रिम सूक्त का ऋषि यह 'मान्धाता यौवनाश्व' है । सूक्त के अन्तिम मन्त्र का ऋषि 'गोधा' है । यह कहता है कि-