पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (इन्द्र) = शत्रु-विद्रावण करनेवाले शासक ! (वयम्) = हम (त्वायवः) = आपकी ही कामनावाले हैं। प्रजाओं को राजा बड़ा प्रिय होना चाहिए। राजा का जीवन प्रजाओं को उसके प्रति अनुरागवाला हो (सखित्वम्) = हम मित्रता को (आरभामहे) = प्रारम्भ करते हैं, अर्थात् परस्पर मित्रभाव से चलते हैं। राष्ट्र के नागरिकों में परस्पर सखित्व होने पर राष्ट्र की शक्ति बढ़ती है । [२] हे इन्द्र ! (नः) = हमें (ऋतस्य पथा नय) = ऋत के मार्ग से ले चलिये। शासक को यह प्रयत्न करना चाहिए कि उसकी प्रजाएँ बड़े व्यवस्थित जीवनवाली हों। उनके सब कार्य समय पर व ठीक स्थान पर होनेवाले हों । इस प्रकार ऋत के मार्ग से ले चल करके हमें (विश्वानि दुरिता अति) = (नय) सब दुरितों से दूर ले चलिये। हम पाप से बचकर दुर्गतियों से भी बचे रहें। (३) इस प्रकार सब प्रजाओं के जीवनों के व्यवस्थित होने पर (अन्यकेषां ज्याकाः) = कुत्सित वृत्तिवाले लोगों की डोरियाँ (अधिधन्वसु) = धनुषों पर ही (नभन्ताम्) = नष्ट हो जाए। प्रजाओं के चरित्र के ऊँचे होने पर शत्रु आक्रमण करने से घबराता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - राजा प्रजा से आदृत हो । राजा प्रजाओं को ठीक मार्ग पर ले चलता हुआ दुर्गति से बचाए ।