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देवता: इन्द्र: ऋषि: सुदाः पैजवनः छन्द: शक्वरी स्वर: धैवतः

प्रो ष्व॑स्मै पुरोर॒थमिन्द्रा॑य शू॒षम॑र्चत । अ॒भीके॑ चिदु लोक॒कृत्सं॒गे स॒मत्सु॑ वृत्र॒हास्माकं॑ बोधि चोदि॒ता नभ॑न्तामन्य॒केषां॑ ज्या॒का अधि॒ धन्व॑सु ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

pro ṣv asmai puroratham indrāya śūṣam arcata | abhīke cid u lokakṛt saṁge samatsu vṛtrahāsmākam bodhi coditā nabhantām anyakeṣāṁ jyākā adhi dhanvasu ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

प्रो इति॑ । सु । अ॒स्मै॒ । पु॒रः॒ऽर॒थम् । इन्द्रा॑य । शू॒षम् । अ॒र्च॒त॒ । अ॒भीके॑ । चि॒त् । ऊँ॒ इति॑ । लो॒क॒ऽकृत् । स॒म्ऽगे । स॒मत्ऽसु॑ । वृ॒त्र॒ऽहा । अ॒स्माक॑म् । बो॒धि॒ । चो॒दि॒ता । नभ॑न्ताम् । अ॒न्य॒केषा॑म् । ज्या॒काः । अधि॑ । धन्व॑ऽसु ॥ १०.१३३.१

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:133» मन्त्र:1 | अष्टक:8» अध्याय:7» वर्ग:21» मन्त्र:1 | मण्डल:10» अनुवाक:11» मन्त्र:1


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ब्रह्ममुनि

इस सूक्त में राजा के रथ के आगे सैनिक चलें, आक्रमणकारी शत्रु को राजा तुरन्त मार दे, प्रजा भी राजा की सहायता करे, आदि विषय हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (अस्मै-इन्द्राय) इस राजा के (पुरोरथम्) रथ के सामने-आगे (शूषम्) सैन्यबल को प्रशस्त करो, जिससे राजा रथ पर बैठा (समत्सु) संग्रामों में (अभीके चित्) समीप में भी (सङ्गे) साम्मुख्य होने पर (लोककृत्) स्थान करनेवाला अविचल (वृत्रहा) शत्रुनाशक (अस्माकं चोदिता) हमारा प्रेरक (बोधि) बोध दे (अन्यकेषां ज्याकाः) अन्यों-शत्रुओं के कुत्सित ज्याएँ डोरियाँ (धन्वसु-अधि) धनुषों में बन्धी (नभन्ताम्) नष्ट हो जावें ॥१॥
भावार्थभाषाः - सङ्ग्राम में राजा के साङ्ग्रामिक रथ के आगे सैनिकबल रहे, सामने आये शत्रुदल पर शस्त्रप्रहार करे, शत्रुओं के धनुषास्त्रों की डोरियाँ टूट जावें, शत्रु परास्त हो जावें ॥१॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अग्रगामी - रथ और शत्रु-शोषक बल

पदार्थान्वयभाषाः - [१] राष्ट्र में शत्रुओं के संहार के लिए राजा सेनापति के रूप में 'इन्द्र' कहलाता है । (अस्मै इन्द्राय) = इस शत्रुओं का विद्रावण करनेवाले सेनापति के लिए (उ) = निश्चय से (सु) = अच्छी प्रकार (पुरोरथम्) = अग्रगतिवाले रथ को तथा (शूषम्) = शत्रु- शोषक बल को (प्र अर्चत) = सम्यक् आदर दो । उस सेनापति को उचित आदर प्राप्त हो जिसका रथ आगे ही आगे बढ़ता है और कभी रणाङ्गण से पराङ्मुख नहीं होता । उस सेनापति को आदर दो जिसका कि बल शत्रुओं का शोषण करनेवाला है । [२] यह इन्द्र (अभीके) = संग्राम में (चित् उ) = निश्चय से (लोककृत्) = अपने स्थान को बनानेवाला है । (समत्सु) = संग्रामों में संगे शत्रुओं के साथ मुठभेड़ होने पर यह (वृत्रहा) = वृत्र का हनन करनेवाला है, राष्ट्र के घेरनेवाले शत्रुओं को समाप्त करनेवाला है [वृ-घेरना] । [३] हे इन्द्र ! इस प्रकार शत्रुहनन करता हुआ तू (अस्माकम्) = हमारा (चोदिता) = प्रेरक (बोधि) = अपने को जान प्रजाओं के अन्दर उत्साह का संचार करनेवाला तू हो । तेरी वीरता के सामने (अन्यकेषाम्) = [कुत्सिते कन् ] इन अधर्म के पक्षवाले कुत्सित शत्रुओं को (ज्याकाः) = धनुष की डोरियाँ (अधिधन्वसु) = धनुषों पर (नभन्ताम्) = नष्ट हो जाएँ। उनका उत्साह मन्द पड़ जाएँ, उनके अस्त्र कुण्ठित हो जाएँ ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-सेनापति का रथ आगे ही आगे बढ़नेवाला हो, उसका बल शत्रुओं का शोषण कर दे। सेनापति शत्रुहनन करता हुआ प्रजाओं के उत्साह को बढ़ाये और शत्रुओं के अस्त्र कुण्ठित हो जाएँ।
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ब्रह्ममुनि

अत्र सूक्ते राज्ञो रथस्याग्रे सैनिका गच्छन्तु आक्रमणकारिणः शत्रून् सद्यो मारयेत् प्रजाजनास्तस्य राज्ञः साहाय्यं दद्युरित्येवमादयो विषयाः सन्ति।

पदार्थान्वयभाषाः - (अस्मै-इन्द्राय) अस्येन्द्रस्य-अस्य राज्ञः “षष्ठ्यर्थे चतुर्थीत्यपि वक्तव्यमिति वार्तिकेन [अष्टा० २।३।६२ चतुर्थी” (पुरोरथम्) रथस्य पुरस्तात् (शूषम्-उ सु प्र-अर्चत) सैन्यबलम् “शूषं बलनाम” [निघ० २।९] अवश्यं प्रशंसत यतः स इन्द्रो राजा रथस्थः (समत्सु-अभीके चित्) सङ्ग्रामेषु “समत्सु सङ्ग्रामनाम” [निघ० २।१७] समीपे “अभीके इत्यासन्नस्य-अभ्यक्ते” [निरु० ३।२०] अपि (सङ्गे) साम्मुख्ये (लोककृत्) स्वस्थानकृत् अविचलितः सन् (वृत्रहा) शत्रुनाशकः (अस्माकं चोदिता बोधि) अस्माकं प्रेरयिता सन् बोधयेत् (अन्यकेषां ज्याकाः) अन्येषां शत्रूणां कुत्सिता ज्याः खल्वपि (धन्वसु-अधि नभन्ताम्) धनुष्षु बद्धाः खलु नश्यन्ताम् “णभ हिंसायाम्” [भ्वादि०] ॥१॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Offer a song of abundant praise in honour of this ruling lord Indra for his mighty force and front rank chariot. He, destroyer of darkness and evil, inspires us in our battles of life at the closest and enlightens us in our struggle for universal freedom. Let the strings of the alien enemy bows be snapped by the strike of the forces of Indra.