पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अस्मिन्) = इस गत मन्त्र के अनुसार पाप के लेश को भी नष्ट करनेवाले, (स्वे) = आत्मीय, अर्थात् आत्मा की ओर चलनेवाले, (हिते) = सबका हित करनेवाले (मित्रे) = अपने जीवन को नीरोग बनानेवाले [प्रमीतेः त्रायते] (शक पूते) = शक्ति से अपने को पवित्र करनेवाले के विषय में (तत् एनः) = वह पाप, अर्थात् शकपूत के विषय में किसी के द्वारा किया जानेवाला पाप कर्म (निगतान् वीरान्) = उन निम्न गतिवाले अथवा निहन्तव्य वीरम्मन्य पुरुषों को (हन्ति) = नष्ट करता है । इन निगत वीरों से किये जानेवाला पाप इनको ही नष्ट करनेवाला होता है । ये शकपूत को कोई हानि नहीं पहुँचा सकते। [२] ये इसलिए इस शकपूत को हानि नहीं पहुँचा सकते (यत्) = क्योंकि (अर्वा) = वह सर्वत्र गतिवाला व्यापक प्रभु इस (अवो:) = [ अवितुः ] रक्षक के [ प्रमीतेः त्रायते] प्रमीति से अपने को बचानेवाले शकपूत के (प्रियासु यज्ञियासु) = [प्रीञ् कान्तौ] कान्त व पवित्र (तनूषु) = शरीरों में (अवः) = रक्षण का (धात्) = धारण करता है। प्रभु इनका रक्षक होता है । उस प्रभु के रक्षकरूपेण होने पर इन्हें हानि पहुँचा ही कौन सकता है ? पाप, पाप करनेवाला का ही नाश कर देता है। इस शकपूत को हानि नहीं पहुँचा सकता ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - शक्ति के द्वारा जीवन को पवित्र करनेवाला का रक्षण प्रभु करते हैं। इसके विषय में पाप की कामनावाला उस पाप से स्वयं नष्ट हो जाता है।