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अधा॑ चि॒न्नु यद्दिधि॑षामहे वाम॒भि प्रि॒यं रेक्ण॒: पत्य॑मानाः । द॒द्वाँ वा॒ यत्पुष्य॑ति॒ रेक्ण॒: सम्वा॑र॒न्नकि॑रस्य म॒घानि॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

adhā cin nu yad didhiṣāmahe vām abhi priyaṁ rekṇaḥ patyamānāḥ | dadvām̐ vā yat puṣyati rekṇaḥ sam v āran nakir asya maghāni ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अध॑ । चि॒त् । नु । यत् । दधि॑षामहे । वा॒म् । अ॒भि । प्रि॒यम् । रेक्णः॑ । पत्य॑मानाः । द॒द्वान् । वा॒ । यत् । पुष्य॑ति । रेक्णः॑ । सम् । ऊँ॒ इति॑ । आ॒र॒न् । नकिः॑ । अ॒स्य॒ । म॒घानि॑ ॥ १०.१३२.३

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:132» मन्त्र:3 | अष्टक:8» अध्याय:7» वर्ग:20» मन्त्र:3 | मण्डल:10» अनुवाक:11» मन्त्र:3


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (पत्यमानाः) ऐश्वर्य करते हुए (वाम्) तुम दोनों के (यत् प्रियं रेक्णः) जो प्रिय धन ज्ञानधन या जीवनधन (अभि दिधिषामहे) हम धारण करते हैं (अधः-चित्-उ) वह अनन्तर ही (यत्-वा रेक्णः-दद्वान्) तुम्हारे लिए उपहारधन या आहारधन श्रोता या आत्मा देता है (अस्य) इसका (मघानि) धन (नकिः-उ) न कभी भी (समारन्) समाप्त होते हैं ॥३॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य धनादि वस्तुओं के स्वामी होते हुए अध्यापक उपदेशकों के ज्ञानधन को प्राप्त करते हैं, साथ ही उन्हें उपहारधन देना चाहिए, इस प्रकार देने से धन समाप्त नहीं होता है एवं प्राण और अपानों से जो जीवनधन मिलता है, उनके लिए आहार देना चाहिए, इससे वह समाप्त नहीं होता है ॥३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

दान व ऐश्वर्य वृद्धि

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (मित्रा) = वरुणौ ! (अधा) = अब (चित् नु) = निश्चय से (यत्) = जब (वाम्) = आपका (दिधिषामहे) = धारण करते हैं व स्तवन करते हैं तो हम (प्रियं रेक्णः) = प्रिय ऐश्वर्य को (अभि-पत्यमानाः) = उभयतः प्राप्त करते हुए होते हैं । इस लोक के ऐश्वर्य 'अभ्युदय' को हम प्राप्त करते हैं तो परलोक के निःश्रेयस को भी प्राप्त करनेवाले होते हैं। 'मित्र' की आराधना हमें नीरोग बनाकर अभ्युदय की प्राप्ति के योग्य बनाती है और 'वरुण' की आराधना निष्पाप बनाकर निःश्रेयस को देनेवाली होती है । [२] (च) = और (दद्वान्) = दानशील पुरुष (यत्) = जिस (रेक्णः) = धन का (पुष्यति) = पोषण करता है, (अस्य मघानि) = इसके धन (नकि) = सभी (रन्) = अपगत नहीं होते । दान से धन बढ़ता ही है, दान से धन कम नहीं होता। दानशील पुरुष इस लोक में अभ्युदय की वृद्धि को करता हुआ परलोक में निःश्रेयस को प्राप्त करता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम मित्र - वरुण की आराधना से अभ्युदय व निः श्रेयस को प्राप्त करें । सदा दानशील बनें, जिससे धन हमारे से अपगत न हों ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (पत्यमानाः) ऐश्वर्यं कुर्वाणाः “पत्यते ऐश्वर्यकर्मा” [निघ० २।२१] (वाम्) युवयोः (यत् प्रियं रेक्णः-अभि दिधिषामहे) यत् प्रियं ज्ञानधनं यद्वा जीवनधनम् “रेक्णो धननाम” [नि० २।१०] वयं भूमिं धारयामः (अध चित्-उ) अनन्तरमपि हि (यत् वा रेक्णः-दद्वान्) यच्चोपहारधनम्-आहारधनं वा युवभ्यां श्रोता, आत्मा वा दत्तवान् (अस्य मघानि नकिः-उ सम् आरन्) अस्य श्रोतुरात्मनो वा धनानि नहि समाप्तिं गच्छन्ति ॥३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - And when we bear and bring liberal gifts of homage to you, ourselves being masters of our favourite wealth and property, or when the generous giver of gifts and homage augments his wealth, then the wealth, power and glory of such a person never diminishes, never exhausts, in fact it increases manifold.