पदार्थान्वयभाषाः - [१] प्रभु यज्ञिय हैं, पूज्य हैं, संगतिकरण योग्य हैं तथा समर्पणीय हैं । (तस्य यज्ञियस्य) = उस यज्ञिय प्रभु की (सुमतौ) = कल्याणी मति में वयं स्याम हम हों। अपि और (भद्रे सौमनसे) = [स्याम] उस उत्तम मन में हम स्थित हों जो कि सबका भद्र व कल्याण ही सोचता है । [२] (सः) = वह (सुत्रामा) = उत्तम त्राण करनेवाला (स्ववान्) = आत्मिक शक्ति को देनेवाला (इन्द्रः) = शत्रु - विद्रावक प्रभु (अस्मे) = हमारे से (द्वेषः) द्वेष को (आरात् चित्) = निश्चय से बहुत दूर (सनुतः) = अन्तर्हित करके (युयोतु) = पृथक् कर दे 'द्वेष हमें फिर देख भी न सके' इस रूप में प्रभु द्वेष को हमारे से दूर कर दे ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु कृपा से हमें सुमति व सौमनस प्राप्त हो । द्वेष हमारे से दूर हो। यह सूक्त शत्रु - विजय से प्रारम्भ होता है, सुमति व सौमनस की प्राप्ति पर समाप्त होता है । साधना यही है कि हम अन्तः शत्रुओं को जीतकर उत्तम बुद्धि व मनवाले बनें। ऐसा बनने पर हम 'शकपूतः'=शक्ति के द्वारा पवित्र जीवनवाले होंगे। तथा नार्मेधः = नृमेध यज्ञ करनेवाले, लोकहित की प्रवृत्तिवाले बनेंगे। यह 'शकपूत नार्मेध' ही अग्रिम सूक्त का ऋषि है। यह इस प्रकार मन्त्र जप करता है-