पदार्थान्वयभाषाः - [१] [एकेन धुर्येण युक्तमनः स्थूरीत्युच्यते] (स्थूरि) [अनः] = एक बैल से युक्त शकट (ऋतुथा) = समय पर (यातम्) = उद्दिष्ट स्थान पर प्राप्त (नहि अस्ति) = नहीं होता है। गाड़ी में दोनों बैलों का होना आवश्यक है। एक बैल का न होना गाड़ी को निकम्मा कर देता है। इसी प्रकार उस प्रभु के बिना अकेला जीव अपने शरीर रथ को उद्दिष्ट स्थल पर नहीं ले जा सकता । सम्पूर्ण सफलता प्रभु से प्राप्त शक्ति पर ही निर्भर करती है । [२] यह प्रभु को विस्मृत करनेवाला व्यक्ति (संगमेषु) = सभाओं में उपस्थित होकर (श्रवः) = ज्ञान को (न विविदे) = नहीं प्राप्त करता है। प्रभु विस्मरण से प्रकृत्ति ज्ञानगोष्ठियों में एकत्रित होने की न होकर पानगोष्ठियों में एकत्रित होने की हो जाती है। एवं ज्ञान वृद्धि न होकर भोगवृद्धि के मार्ग पर वह बढ़ता है और उन भोगों में ही डूब जाता है । [३] इसलिए (गव्यन्तः) = उत्तम ज्ञानेन्द्रियों की कामना करते हुए, (अश्वायन्तः) = उत्तम कर्मेन्द्रियों की कामना करते हुए, (वाजयन्तः) = शक्ति की कामना करते हुए (विप्राः) = ज्ञानी पुरुष (इन्द्रम्) = उस प्रभु को ही (सख्याय) = मित्रता के लिए चाहते हैं। प्रभु की मित्रता में ही मनुष्य लक्ष्य की ओर अपने शरीर-रथ को ले चलता है, भटकता नहीं । भोगमार्ग पर न जाने से उसकी शक्ति स्थिर रहती है । उसकी ज्ञानेन्द्रियाँ व कर्मेन्द्रियाँ क्षीण नहीं होती ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु की मित्रता में मनुष्य मार्गभ्रष्ट न होकर अपने ज्ञान व शक्ति का वर्धन करता हुआ लक्ष्यस्थान पर पहुँचता है ।