वासनाशून्य हृदय में प्रभु के प्रति नमन
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अंग) = प्रिय ! (यथा) = जैसे (यवमन्तः) = जौवाले, जौ की कृषि करनेवाले, (चित्) = निश्चय से (यवम्) = जौ को (अनुपूर्वम्) = क्रमशः (वियूय) = पृथक् पृथक् करके (कुवित्) = खूब ही (दान्ति) = काट डालते हैं । इसी प्रकार (ये) = जो व्यक्ति अपने हृदयक्षेत्र से वासनाओं को उखाड़ डालते हैं और इस वासनाशून्य (बर्हिषः) = जिसमें से वासनाओं का उद्धर्हण कर दिया गया है, उस हृदय में (नमः वृक्तिम्) = नमस्कार के वर्जन को (न जग्यु:) = नहीं प्राप्त होते हैं । अर्थात् जो अपने हृदयों को वासनाशून्य बनाते हैं और उन हृदयों में सदा प्रभु के प्रति नमन की भावना को धारण करते हैं, (एषाम्) = इन व्यक्तियों के (इह इह) = इस इस स्थान पर, अर्थात् जब-जब आवश्यकता पड़े (भोजनानि) = पालन के साधनभूत भोग्य पदार्थों को प्राप्त कराइये । [२] मनुष्य का कर्त्तव्य यह है कि एक-एक करके वासना को विनष्ट करनेवाला हो । निर्वासन हृदय में प्रभु का नमन करे । प्रभु इसके योगक्षेम को प्राप्त कराते ही हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - मनुष्य वासनाओं का उद्धर्हण करके वासनाशून्य हृदय में प्रभु के प्रति नमनवाला होता है, तो प्रभु उसके योगक्षेम की स्वयं व्यवस्था करते हैं ।