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कु॒विद॒ङ्ग यव॑मन्तो॒ यवं॑ चि॒द्यथा॒ दान्त्य॑नुपू॒र्वं वि॒यूय॑ । इ॒हेहै॑षां कृणुहि॒ भोज॑नानि॒ ये ब॒र्हिषो॒ नमो॑वृक्तिं॒ न ज॒ग्मुः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

kuvid aṅga yavamanto yavaṁ cid yathā dānty anupūrvaṁ viyūya | ihehaiṣāṁ kṛṇuhi bhojanāni ye barhiṣo namovṛktiṁ na jagmuḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

कु॒वित् । अ॒ङ्ग । यव॑ऽमन्तः । यव॑म् । चि॒त् । यथा॑ । दान्ति॑ । अ॒नु॒ऽपू॒र्वम् । वि॒ऽयूय॑ । इ॒हऽइ॑ह । ए॒षा॒म् । कृ॒णु॒हि॒ । भोज॑नानि । ये । ब॒र्हिषः॑ । नमः॑ऽवृक्तिम् । न । ज॒ग्मुः ॥ १०.१३१.२

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:131» मन्त्र:2 | अष्टक:8» अध्याय:7» वर्ग:19» मन्त्र:2 | मण्डल:10» अनुवाक:11» मन्त्र:2


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अङ्ग) हे परमात्मन् ! वा राजन् ! (कुवित्) यह प्रशंसनीय है (यवमन्तः) अन्नवान् किसान (यथा यवं चित्) जैसे अन्न को भी (वियूय) पृथक्-पृथक् करके (अनुपूर्वम्) आनुपूर्व्य से-अनुक्रम से (दान्ति) काटते हैं, ऐसे (इह-इह) इस स्थान में इस स्थान में (एषां भोजनानि) इन यजमानों की भोग्य वस्तुओं को (कृणुहि) कर (ये) जो (बर्हिषः) प्रजा की (वृक्तिम्) अन्नदाननिषेध क्रिया को (न जग्मुः) नहीं प्राप्त होते हैं, किन्तु देते हैं, प्रशंसनीय है ॥२॥
भावार्थभाषाः - जैसे किसान अनुक्रम से पके अन्न को काटते हैं, एवं प्रजाजन के लिये अनुक्रम से श्रेष्ठ राष्ट्रसंचालक भाग पृथक्-पृथक् यथायोग्य भाग दें, यह प्रशंसनीय कार्य है ॥२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

वासनाशून्य हृदय में प्रभु के प्रति नमन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अंग) = प्रिय ! (यथा) = जैसे (यवमन्तः) = जौवाले, जौ की कृषि करनेवाले, (चित्) = निश्चय से (यवम्) = जौ को (अनुपूर्वम्) = क्रमशः (वियूय) = पृथक् पृथक् करके (कुवित्) = खूब ही (दान्ति) = काट डालते हैं । इसी प्रकार (ये) = जो व्यक्ति अपने हृदयक्षेत्र से वासनाओं को उखाड़ डालते हैं और इस वासनाशून्य (बर्हिषः) = जिसमें से वासनाओं का उद्धर्हण कर दिया गया है, उस हृदय में (नमः वृक्तिम्) = नमस्कार के वर्जन को (न जग्यु:) = नहीं प्राप्त होते हैं । अर्थात् जो अपने हृदयों को वासनाशून्य बनाते हैं और उन हृदयों में सदा प्रभु के प्रति नमन की भावना को धारण करते हैं, (एषाम्) = इन व्यक्तियों के (इह इह) = इस इस स्थान पर, अर्थात् जब-जब आवश्यकता पड़े (भोजनानि) = पालन के साधनभूत भोग्य पदार्थों को प्राप्त कराइये । [२] मनुष्य का कर्त्तव्य यह है कि एक-एक करके वासना को विनष्ट करनेवाला हो । निर्वासन हृदय में प्रभु का नमन करे । प्रभु इसके योगक्षेम को प्राप्त कराते ही हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - मनुष्य वासनाओं का उद्धर्हण करके वासनाशून्य हृदय में प्रभु के प्रति नमनवाला होता है, तो प्रभु उसके योगक्षेम की स्वयं व्यवस्था करते हैं ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अङ्ग) हे परमात्मन् ! राजन् ! वा (कुवित्) प्रशंसनीयमिदं यत् “कुवित् भूर्यर्थप्रशंसायां च” [अव्ययार्थनिबन्धनम्] (यवमन्तः) अन्नवन्तः “यवं दुहन्तो-अन्नं दुहन्तो” [निरु० ६।२६] कृषकाः (यथा यवं चित्) यथाऽन्नमपि (वियूय-अनुपूर्वं दान्ति) पृथक् पृथक् कृत्वा खल्वानुपूर्व्येण लुनन्ति “दाप् लवने” [अदादि०] एवं (इह-इह) अत्र स्थाने अत्र स्थाने (एषां भोजनानि कृणुहि) एतेषां यजमानानां भोगवस्तूनि कुरु (ये बर्हिषः) ये प्रजायाः (वृक्तिं न जग्मुः) अन्नदानवर्जनं न प्राप्नुवन्ति किन्तु तस्या भागं प्रयच्छन्ति हि ॥२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Well then, just as master farmers of grain harvest the crop in order and separate the grain from the chaff, so, dear lord, here, there, everywhere, in order create and provide food and sustenance for those who never neglect yajnic offerings but bear the holy grass and bring homage to the vedi.