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स॒प्त क्ष॑रन्ति॒ शिश॑वे म॒रुत्व॑ते पि॒त्रे पु॒त्रासो॒ अप्य॑वीवतन्नृ॒तम् । उ॒भे इद॑स्यो॒भय॑स्य राजत उ॒भे य॑तेते उ॒भय॑स्य पुष्यतः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

sapta kṣaranti śiśave marutvate pitre putrāso apy avīvatann ṛtam | ubhe id asyobhayasya rājata ubhe yatete ubhayasya puṣyataḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

स॒प्त । क्ष॒र॒न्ति॒ । शिश॑वे । म॒रुत्व॑ते । पि॒त्रे । पु॒त्रासः॑ । अपि॑ । अ॒वी॒व॒त॒न् । ऋ॒तम् । उ॒भे इति॑ । इत् । अ॒स्य॒ । उ॒भय॑स्य । रा॒ज॒तः॒ । उ॒भे इति॑ । य॒ते॒ते॒ इति॑ । उ॒भय॑स्य । पु॒ष्य॒तः॒ ॥ १०.१३.५

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:13» मन्त्र:5 | अष्टक:7» अध्याय:6» वर्ग:13» मन्त्र:5 | मण्डल:10» अनुवाक:1» मन्त्र:5


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (मरुत्वते शिशवे) प्राणवान् शंसनीय-प्रशंसनीय जीवात्मा के लिए (पित्रे पुत्रासः सप्त क्षरन्ति) पिता समान के लिए पुत्ररूप सर्पणशील प्राण सञ्चार करते हैं (ऋतम्-अपि-अवीवतन्) जीवनयज्ञ को अवश्य वर्ताते हैं-चलाते हैं (अस्य-उभयस्य) इस जीवात्मा के उभयरूप-दोनों रूप, अर्थात् मनुष्यरूप पुनः-पुनः जन्मते हुए तथा देवरूप मुमुक्षु के (उभे-इत्-राजतः) बृहस्पति और यम दोनों स्वामित्व करते हैं, बृहस्पति समागम में और यम प्राणहरण में (यतेते) वे दोनों इस प्रकार यत्न करते हैं, (उभे-उभयस्य पुष्यतः) वे दोनों बृहस्पति और यम दोनों रूपवाले मुमुक्षु और साधारण जन को मुक्ति और भुक्ति फल को देते हैं ॥५॥
भावार्थभाषाः - आत्मा जब शरीर धारण करके संसार में प्राणवान् होता है, तब प्राण इसके पुत्र के समान रक्षार्थ सञ्चार करते हैं और जीवनयज्ञ को आगे बढ़ाते हैं। इस जीवात्मा के दो रूपों मुमुक्षुरूप और बारम्बार जन्म लेनेवाले मनुष्यरूप का बृहस्पति और यम स्वामित्व करते हैं और मुक्ति तथा बारम्बार जन्म देकर भुक्ति-भोग फल देते हैं ॥५॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'शिशु' व 'मरुत्वान्'

पदार्थान्वयभाषाः - [१] पिछले मन्त्र के 'प्रारिरेचीत्' की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि (सप्त) = 'कर्णाविमौ नासिके चक्षणी मुखम्' = दो कान, दो नासिका छिद्र, दो आँखें व मुख ये सातों (क्षरन्ति) = मल का क्षरण करके निर्मल हो जाते हैं। परन्तु ये मल का क्षरण करनेवाले किसके लिये होते हैं ? [क] (शिशवे) = [ शो तनूकरणे] बुद्धि को सूक्ष्म बनानेवाले के लिये । जो स्वाध्याय के द्वारा बुद्धि को निरन्तर सूक्ष्म बनाने का प्रयत्न करता है, उसकी इन्द्रियाँ निर्मल बनती है। [ख] (मरुत्वते) = प्राणों की साधना करनेवाले के लिये । प्राण-साधना से इन्द्रियों के दोष दूर होते ही हैं । जो भी व्यक्ति बुद्धि को सूक्ष्म करने का प्रयत्न करता है तथा प्राणों की साधना करता है उसकी इन्द्रियाँ निर्मल बनती ही हैं । [२] (पुत्रासः) = प्रभु के पुत्र (पित्रे) = अपने पिता परमात्मा के लिये (ऋतं अपि अवीवृतन्) = ऋतकामी वरण करते हैं । प्रभु प्राप्ति के लिये ऋत का पालन आवश्यक है। 'ठीक समय पर कार्य करना तथा सत्य व्यवहार करना' ही ऋत है। इस ऋत के पालन करनेवाले को ही प्रभु प्राप्त होते हैं। [३] इस प्रकार ऋत का पालन करनेवाले (उभे इत्) = पति-पत्नी दोनों ही (अस्य) = इस प्रभु के होते हैं । (उभयस्य) = शरीर व मस्तिष्क दोनों के ही (राजतः) = शासन करनेवाले होते हैं । (उभे यतेते) = ये दोनों गृह को स्वर्ग बनाने के लिये यत्न करते हैं । (उभयस्य पुष्यतः) = 'अभ्युदय व निःश्रेयस' दोनों का ही पोषण करनेवाले होते हैं । प्रकृति विद्या व आत्मविद्या दोनों को ही पढ़ते हैं। अपने जीवन में ये ' व्यक्तिवाद व समाजवाद' दोनों का ही पोषण करते हैं। ये प्रेय व श्रेय दोनों का ही ये पोषण करते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-शिशु व मरुत्वान् की इन्द्रियाँ निर्मल होती हैं। ऋत का पालक प्रभु का प्रिय होता है । ऐसे पति-पत्नी अभ्युदय व निःश्रेयस दोनों को सिद्ध करनेवाले होते हैं । सूक्त का प्रारम्भ इन शब्दों से होता है कि प्रभु नमन से हमारे साथ ज्ञान का सम्पर्क होता है । [१] हम ज्ञानी व स्वस्थ बनते हैं, [२] हम यज्ञशील व स्वाध्याय के व्रती हों, [३] हम प्रभु के प्रिय शरीर बनें, [४] अभ्युदय व निःश्रेयस दोनों का ही पोषण करें, [५] इसके लिये शासक नियामक प्रभु का पूजन करें।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (मरुत्वते शिशवे) प्राणवते शंसनीयाय जीवात्मने “प्राणो वै मरुतः” [ऐ०३।१६] (पित्रे पुत्रासः सप्त क्षरन्ति) पितृभूताय पुत्राः पुत्ररूपाः सर्पणशीला ते प्राणाः सञ्चलन्ति ‘क्षर सञ्चलने” [भ्वादिः] (ऋतम्-अपि अवीवतन्) जीवनयज्ञं खल्ववश्यं वर्तयन्ति चालयन्ति ‘वृतु धातोर्णिजन्तस्य लुङि चङि प्रयोग ऋकारलोपश्छान्दसः’ (अस्य-उभयस्य) अस्य जीवात्मन उभयरूपस्य मनुष्यरूपस्य पुनः पुनर्जायमानस्य, देवभूतस्य मुमुक्षोश्च (उभे-इत् राजतः) बृहस्पतिर्यमश्च, बृहस्पतेः सङ्गमने यमस्य क्रियानिमित्ते स्वामित्वं कुरुतः (यतेते) यत्नं विधत्तः (उभे-उभयस्य पुष्यतः) उभे निमित्ते ह्युभयस्य पुनः पुनर्जायमानस्य मुक्तिं गतस्य च फलं प्रयच्छतः ॥५॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - As children for the parent, seven poetic compositions of the Veda shower the light and bliss of eternal truth on the soul, master of pranic energies and abiding within at the heart in the body. Both thought and speech, heaven and earth inspire and elevate both divines and humans, both exercise both to rise and both strengthen and refine both orders of life, both coexist with the Law.