पदार्थान्वयभाषाः - [१] पिछले मन्त्र के 'प्रारिरेचीत्' की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि (सप्त) = 'कर्णाविमौ नासिके चक्षणी मुखम्' = दो कान, दो नासिका छिद्र, दो आँखें व मुख ये सातों (क्षरन्ति) = मल का क्षरण करके निर्मल हो जाते हैं। परन्तु ये मल का क्षरण करनेवाले किसके लिये होते हैं ? [क] (शिशवे) = [ शो तनूकरणे] बुद्धि को सूक्ष्म बनानेवाले के लिये । जो स्वाध्याय के द्वारा बुद्धि को निरन्तर सूक्ष्म बनाने का प्रयत्न करता है, उसकी इन्द्रियाँ निर्मल बनती है। [ख] (मरुत्वते) = प्राणों की साधना करनेवाले के लिये । प्राण-साधना से इन्द्रियों के दोष दूर होते ही हैं । जो भी व्यक्ति बुद्धि को सूक्ष्म करने का प्रयत्न करता है तथा प्राणों की साधना करता है उसकी इन्द्रियाँ निर्मल बनती ही हैं । [२] (पुत्रासः) = प्रभु के पुत्र (पित्रे) = अपने पिता परमात्मा के लिये (ऋतं अपि अवीवृतन्) = ऋतकामी वरण करते हैं । प्रभु प्राप्ति के लिये ऋत का पालन आवश्यक है। 'ठीक समय पर कार्य करना तथा सत्य व्यवहार करना' ही ऋत है। इस ऋत के पालन करनेवाले को ही प्रभु प्राप्त होते हैं। [३] इस प्रकार ऋत का पालन करनेवाले (उभे इत्) = पति-पत्नी दोनों ही (अस्य) = इस प्रभु के होते हैं । (उभयस्य) = शरीर व मस्तिष्क दोनों के ही (राजतः) = शासन करनेवाले होते हैं । (उभे यतेते) = ये दोनों गृह को स्वर्ग बनाने के लिये यत्न करते हैं । (उभयस्य पुष्यतः) = 'अभ्युदय व निःश्रेयस' दोनों का ही पोषण करनेवाले होते हैं । प्रकृति विद्या व आत्मविद्या दोनों को ही पढ़ते हैं। अपने जीवन में ये ' व्यक्तिवाद व समाजवाद' दोनों का ही पोषण करते हैं। ये प्रेय व श्रेय दोनों का ही ये पोषण करते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-शिशु व मरुत्वान् की इन्द्रियाँ निर्मल होती हैं। ऋत का पालक प्रभु का प्रिय होता है । ऐसे पति-पत्नी अभ्युदय व निःश्रेयस दोनों को सिद्ध करनेवाले होते हैं । सूक्त का प्रारम्भ इन शब्दों से होता है कि प्रभु नमन से हमारे साथ ज्ञान का सम्पर्क होता है । [१] हम ज्ञानी व स्वस्थ बनते हैं, [२] हम यज्ञशील व स्वाध्याय के व्रती हों, [३] हम प्रभु के प्रिय शरीर बनें, [४] अभ्युदय व निःश्रेयस दोनों का ही पोषण करें, [५] इसके लिये शासक नियामक प्रभु का पूजन करें।