पञ्च पदारोहण व चतुष्पद्यनुगमन
पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत मन्त्र के अनुसार प्रभु के ऐश्वर्य में अपने को (रुपः) = आरोपित करनेवाला मैं (पञ्च पदानि) = पाँचों गन्तव्य यज्ञों का (अन्वरोहम्) = आरोहण करता हूँ । अर्थात् गृहस्थ के लिये करने योग्य पाँचों यज्ञों को मैं नित्य प्रति करनेवाला बनता हूँ। मैं इस बात को नहीं भूलता कि 'अपंचयज्ञो मलिम्लुच: '-पाँचों यज्ञों को न करनेवाला गृहस्थ चोर ही है । [२] मैं (चतुष्पदीम्) = 'ऋग्, यजु, साम, अथर्व' रूप चार कदमों वाली इस वेदवाणी को (व्रतेन) = ब्रह्मचर्य व्रत के द्वारा (अन्वेमि) = क्रमशः प्राप्त करने का प्रयत्न करता हूँ। बिना व्रत के तो ज्ञान प्राप्ति का सम्भव ही नहीं है। मैं व्रत को अपनाता हूँ, और व्रत के द्वारा इस चतुष्पदी वेदवाणी का ग्रहण करता हूँ । [३] (एताम्) = इस वेदवाणी को अक्षरेण उस अविनाशी प्रभु के द्वारा (प्रतिमिमे) = अपने अन्दर पूर्णरूप से निर्माण करता हूँ। वस्तुतः वेदार्थ का पूर्ण ज्ञान तो प्रभु ध्यान से ही होता है। प्रभु का ध्यान हमें मन्त्रार्थद्रष्टा ऋषि बनाता है। [४] ऋतस्य नाभौ ऋत के, यज्ञ के अथवा नियमितता - [regularity] के बन्धन में [णह बन्धने] (अधिसंपुनामि) = मैं अपने को खूब ही पवित्र करता हूँ । यज्ञशीलता से तथा सब क्रियाओं को ठीक समय व ठीक स्थान पर करने से मैं अपने जीवन को पवित्र करता हूँ ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम पाँचों यज्ञों को करें। स्वाध्याय का व्रत लेकर वेदज्ञान को प्राप्त करें। प्रभु- ध्यान से इस वेदवाणी का साक्षात्कार करें। यज्ञों व नियम परायणता से जीवन को पवित्र करें।