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ति॒र॒श्चीनो॒ वित॑तो र॒श्मिरे॑षाम॒धः स्वि॑दा॒सी३दु॒परि॑ स्विदासी३त् । रे॒तो॒धा आ॑सन्महि॒मान॑ आसन्त्स्व॒धा अ॒वस्ता॒त्प्रय॑तिः प॒रस्ता॑त् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tiraścīno vitato raśmir eṣām adhaḥ svid āsī3d upari svid āsī3t | retodhā āsan mahimāna āsan svadhā avastāt prayatiḥ parastāt ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ति॒र॒श्चीनः॑ । विऽत॑तः । र॒श्मिः । ए॒षा॒म् । अ॒धः । स्वि॑त् । आ॒सी॒३त् । उ॒परि॑ । स्वित् । आ॒सी॒३त् । रे॒तः॒ऽधाः । आ॒स॒न् । म॒हि॒मानः॑ । आ॒स॒न् । स्व॒धा । अ॒वस्ता॑त् । प्रऽय॑तिः । प॒रस्ता॑त् ॥ १०.१२९.५

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:129» मन्त्र:5 | अष्टक:8» अध्याय:7» वर्ग:17» मन्त्र:5 | मण्डल:10» अनुवाक:11» मन्त्र:5


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (रेतोधाः) प्राणी सृष्टि से पूर्व शरीर की बीजशक्ति कामभाव रेत नाम से कही है, उस रेत अर्थात् मानवबीजशक्ति को धारण करनेवाले आत्माएँ (आसन्) थे (महिमानः-आसन्) वे महान्-अर्थात् असंख्यात थे (एषां-रश्मिः) इनकी बन्धनडोरी या लगाम पूर्वजन्म में किये कर्मों का संस्कार है (तिरश्चीनः-विततः) वह संस्कार विस्तृत फैला हुआ है, जो कि (अधः स्वित्-आसीत्) निकृष्ट योनि में जन्म देने का हेतु है तथा (उपरि स्वित्-आसीत्) उत्कृष्ट योनि में जन्म देने का हेतु है (अवस्तात् स्वधा) शरीर के अवर भाग में स्वधारणा जन्मग्रहण करना (परस्तात् प्रयतिः) और शरीर के पर भाग में मृत्यु है ॥५॥
भावार्थभाषाः - भोगों की कामनारूप मानवबीजशक्ति को धारण करनेवाले आत्मा सृष्टि से पहले थे और वे असंख्यात थे, इनका पूर्वकर्मकृत संस्कार डोरी या लगाम के समान शरीर में खींच कर लाता है, वह निकृष्टयोनिसम्बन्धी और उत्कृष्टयोनिसम्बन्धी होता है, शरीर के अवरभाग में जन्म है और परभाग में प्रयाण मृत्यु है ॥५॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रभु की स्वधा शक्ति

पदार्थान्वयभाषाः - (एषाम्) = इन पूर्वोक्त तत्त्वों की रश्मि (रश्मिः) = सूर्यरश्मि के समान (तिरः चित् विततः) = बहुत दूर-दूर तक व्याप्त हुई, (अधः स्वित् आसीत्) = नीचे भी और (उपरिस्वित् आसीत्) = ऊपर भी (रेतः-धाः आसन्) = 'रेतस' को धारण करनेवाले तत्त्व भी थे। (महिमानः आसन्) = वे महान् सामर्थ्यवाले थे। (अवस्तात् स्वधा) = 'स्वधा' अर्थात् प्रकृति नीची बनाई गई है और (परस्तात् प्रयतिः) = उससे ऊँची शक्ति प्रयत्नवाला आत्मा है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - एक आत्मतत्त्व विद्यमान था ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (रेतोधाः-आसन्) प्राणिसृष्टेः पूर्वं शरीरस्य बीजशक्तिः-काम उक्तो रेत इति नामतः, रेतसो धारयितार आत्मान आसन् (महिमानः-आसन्) ते महान्तोऽसङ्ख्याताः खल्वासन् (एषां रश्मिः) एतेषां बन्धनरश्मिर्यद्वा बन्धनप्रग्रहः “अभिशवो वै रश्मयः” [श० ५।४।३।१४] पूर्वकर्मकृतसंस्कारः (तिरश्चीनः-विततः) विस्तृतः “तिरस्तीर्णो भवति” [निरु० ३।२०] तथा प्रसृतः-आसीत् (अधः स्वित् आसीत्-उपरि स्वित्-आसीत्) निकृष्टयोनिजन्म हेतुरप्यासीदुत्कृष्टयोनिजन्महेतुः खल्वप्यासीत् (अवस्तात् स्वधा परस्तात् प्रयतिः) शरीरस्यावरभागे स्वधारणा जन्मग्रहणं परभागे प्रयाणं मृत्युर्भवति ॥५॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - The waves and vibrations of these causal potentials of divine Prakrti extend in time and space all round, up, down and transverse. There are the individual souls also, seedlings great and yearning for emergence into life. In all this process of creation and evolution, the divine will is supreme, and the divine potential, Prakrti, the seeding souls, and potential evolutions, are all subservient and subordinate to the divine will.