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न मृ॒त्युरा॑सीद॒मृतं॒ न तर्हि॒ न रात्र्या॒ अह्न॑ आसीत्प्रके॒तः । आनी॑दवा॒तं स्व॒धया॒ तदेकं॒ तस्मा॑द्धा॒न्यन्न प॒रः किं च॒नास॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

na mṛtyur āsīd amṛtaṁ na tarhi na rātryā ahna āsīt praketaḥ | ānīd avātaṁ svadhayā tad ekaṁ tasmād dhānyan na paraḥ kiṁ canāsa ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

न । मृ॒त्युः । आ॒सी॒त् । अ॒मृत॑म् । न । तर्हि॑ । न । रात्र्याः॑ । अह्नः॑ । आ॒सी॒त् । प्र॒ऽके॒तः । आनी॑त् । अ॒वा॒तम् । स्व॒धया॑ । तत् । एक॑म् । तस्मा॑त् । ह॒ । अ॒न्यत् । न । प॒रः । किम् । च॒न । आ॒स॒ ॥ १०.१२९.२

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:129» मन्त्र:2 | अष्टक:8» अध्याय:7» वर्ग:17» मन्त्र:2 | मण्डल:10» अनुवाक:11» मन्त्र:2


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (मृत्युः-न-आसीत्) सृष्टि से पूर्व मृत्यु भी न था तो फिर क्या अमृत था ? (तर्हि) उस समय मृत्यु के न होने पर (अमृतं न) अमृत न था (रात्र्याः अह्नः) रात्रि का दिन का (प्रकेतः) प्रज्ञान-पूर्वरूप (न-आसीत्) नहीं था (तत्-एकम्) तब वह एक तत्त्व (अवातम्) वायु की अपेक्षा से रहित (स्वधया) स्व धारणशक्ति से (आनीत्) स्वसत्तारूप से जीता जागता ब्रह्मतत्त्व था (तस्मात्-अन्यत्) उससे भिन्न (किम्-चन) कुछ भी (परः-न-आस) उससे अतिरिक्त नहीं था ॥२॥
भावार्थभाषाः - सृष्टि से पूर्व मृत्यु नहीं था, क्योंकि मरने योग्य कोई था नहीं, तो मृत्यु कैसे हो ? मृत्यु के अभाव में अमृत हो, सो अमृत भी नहीं, क्योंकि मृत्यु की अपेक्षा से अमृत की कल्पना होती है, अतः अमृत के होने की कल्पना भी नहीं, दिन रात्रि का पूर्वरूप भी न था, क्योंकि सृष्टि होने पर दिन रात्रि का व्यवहार होता है, हाँ एक तत्त्व वायु द्वारा जीवन लेनेवाला नहीं, किन्तु स्वधारणशक्ति से स्वसत्तारूप जीवन धारण करता हुआ जीता जागता ब्रह्म था, उससे अतिरिक्त और कुछ न था ॥२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

परमशक्तित

पदार्थान्वयभाषाः - (मृत्युः न आसीत्) = उस समय मृत्यु न थी, (तर्हि न अमृतम्) = और उस समय न अमृतत्व था। अर्थात् जीव की सत्ता, जीवन का लोप दोनों नहीं थे। (नः रात्र्याः प्रकेतः आसीत्) = न रात्रि का ज्ञान था और (न अह्नः प्रकेतः आसीत्) = न दिन का ज्ञान था। उस तत्त्व का स्वरूप (आनीत्) = प्राणशक्ति रूप था, परन्तु (अवातम्) = स्थूल वायु न थी । (तत् एकम्) = वह एक (स्वधया) = अपने ही बल से समस्त जगत् को धारण करनेवाला अपनी शक्ति से युक्त था । (तस्मात् अन्यत्) = उससे दूसरा पदार्थ (किंचन) = कुछ भी (परः न आस) = उससे अधिक सूक्ष्म न था ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - उस समय मृत्यु-जीवन नहीं था, दिन-रात्रि नहीं थे । प्राण शक्ति थी ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (मृत्युः-न-आसीत्) सृष्टितः पूर्वं मृत्युर्मारकोऽपि नासीत् (तर्हि) तदा, मृत्योरभावेऽमृतं भवेत्, उच्यते (अमृतं न) अमृतं नासीत् (रात्र्याः-अह्नः प्रकेतः-न-आसीत्) रात्रेर्दिनस्य प्रज्ञानं पूर्वरूपमपि नासीत् (तत्-एकम्-अवातम्) तदा खल्वेकं तत्त्वं वायोरपेक्षारहितं (स्वधया-आनीत्) स्वधारणशक्त्या जीवनं धारयत्सदासीत् तद्ब्रह्मतत्त्वमासीत् (तस्मात्-अन्यत् किञ्चन-परः-न-आस) ततो भिन्नं किमपि नासीत् ॥२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - There is, then, neither death nor deathlessness of immortality, neither night nor day as we know the night and day. There is only That, the One self-existent Brahma, breathing without breath, the sole One, one with its potential. Any other apart or beyond That there was none whatsoever.