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नास॑दासी॒न्नो सदा॑सीत्त॒दानीं॒ नासी॒द्रजो॒ नो व्यो॑मा प॒रो यत् । किमाव॑रीव॒: कुह॒ कस्य॒ शर्म॒न्नम्भ॒: किमा॑सी॒द्गह॑नं गभी॒रम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

nāsad āsīn no sad āsīt tadānīṁ nāsīd rajo no vyomā paro yat | kim āvarīvaḥ kuha kasya śarmann ambhaḥ kim āsīd gahanaṁ gabhīram ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

न । अस॑त् । आ॒सी॒त् । नो इति॑ । सत् । आ॒सी॒त् । त॒दानी॑म् । न । आ॒सी॒त् । रजः॑ । नो इति॑ । विऽओ॑म । प॒रः । यत् । किम् । आ । अ॒व॒री॒व॒रिति॑ । कुह॑ । कस्य॑ । शर्म॑न् । अम्भः॑ । किम् । आ॒सी॒त् । गह॑नम् । ग॒भी॒रम् ॥ १०.१२९.१

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:129» मन्त्र:1 | अष्टक:8» अध्याय:7» वर्ग:17» मन्त्र:1 | मण्डल:10» अनुवाक:11» मन्त्र:1


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ब्रह्ममुनि

इस सूक्त में सृष्टि से पूर्व अन्धकाररूप या परमात्मा के सम्मुख उपादान द्रव्यभाव से वर्तमान था, आत्माएँ भी साधारण और मुक्त बहुत थे, इत्यादि विषय हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (तदानीम्) सृष्टि से पूर्व उस समय प्रलय अवस्था में (असत्-न-आसीत्) शून्य नितान्त अभाव न था (सत्-नो-आसीत्) सत्-प्रकटरूप भी कुच्छ न था (रजः-न-आसीत्) रञ्जनात्मक कणमय गगन-अन्तरिक्ष भी न था (परः-व्योम न-उ-यत्) विश्व का परवर्ती सीमारूप विशिष्ट रक्षक आवर्त-घेरा खगोल आकाश भी न था (किम्-आ-अवरीवः) आवरणीय के अभाव से भलीभाँति आवरक भी क्या हो सके ? न था (कुह कस्य शर्मन्) कहाँ ? न कहीं भी तथा प्रदेश था, किसके सुखनिमित्त हो (गहनं गभीरम्-अम्भः किम्-आसीत्) गहन गम्भीर सूक्ष्म जल भी क्या हो सके अर्थात् नहीं था, जिससे भोग्य वस्तु उत्पन्न हो, जिसमें सृष्टि का बीज ईश्वर छोड़े ॥१॥
भावार्थभाषाः - सृष्टि से पूर्व न शून्यमात्र अत्यन्त अभाव था, परन्तु वह जो था, प्रकटरूप भी न था, न रञ्जनात्मक कणमय गगन था, न परवर्ती सीमावर्ती आवर्त घेरा था, जब आवरणीय पदार्थ या जगत् न था, तो आवर्त भी क्या हो, वह भी न था, कहाँ फिर सुख शरण किसके लिये हो एवं भोग्य भोक्ता की वर्तमानता भी न थी, सूक्ष्मजलपरमाणुप्रवाह या परमाणुसमुद्र भी न था, कहने योग्य कुछ न था, पर था, कुछ अप्रकटरूप था ॥१॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सत् और असत्

पदार्थान्वयभाषाः - (तदानीम्) = इस जगत् के उत्पन्न होने के पूर्व (न असत् आसीत्) = न असत् था (नो सत् आसीत्) = और न सत् था । (न रजः आसीत्) = उस समय नाना लोक भी न थे। (नो व्योम) = न आकाश था । (यत् परः) = जो उससे भी परे है वह भी न था । उस समय (किम् आ अवरीवः) = क्या पदार्थ सबको चारों ओर से घेर सकता था ? (कुह) - यह सब फिर कहाँ था और (कस्य शर्मन्) = किसके आश्रय में था । तो फिर (किम्) = क्या (गहनं गभीरं अम्भः आसीत्) = गहन और गम्भीर का समुद्री जल तो कहाँ ही था ?
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सृष्टि उत्पत्ति से क्या था ? इस प्रश्न को विविध प्रकार से पूछा है उस समय सत नहीं था, असत् भी नहीं था ।
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ब्रह्ममुनि

अस्मिन् सूक्ते सृष्टितः पूर्वं तमोरूपमासीत् उपादानमव्यक्तं परमात्मनः सम्मुखं तुच्छभावेन वर्तमानमासीत् यतः सृष्टिराबभूव साधारणा आत्मानो मुक्ताश्चापि बहव आसन्नित्यादयो विषया वर्ण्यन्ते।

पदार्थान्वयभाषाः - (तदानीम्) सृष्टितः पूर्वं तदानीं प्रलयावस्थायां (असत्-न-आसीत्) शून्यं नितान्ताभावो नासीत् (सत्-नो-आसीत्) सत् प्रकटरूपमपि वर्त्तमानं किञ्चन नासीत् (रजः-न-आसीत्) रञ्जनात्मकं कणमयं गगनमन्तरिक्षमपि नासीत् “भूरञ्जिम्यां कित्” [उणा० ४।२१७] [रजः सूक्ष्मधूलिः-दयानन्दः] “रजसोऽन्तरिक्षलोकस्य” [निरु० १२।७] (परः-व्योम न-उ-यत्) विश्वस्य परवर्ती विशिष्टरक्षक आवर्तः खगोलाकाशोऽपि नैवासीत् (किम् आ अवरीवः) पुनरावरणीयाभावाद् भृशमावरकमपि किं स्यात् ? नासीदित्यर्थः (कुह कस्य शर्मन्) कुत्र-न कुत्रापि तथा प्रदेश आसीत् कस्य सुखनिमित्तं स्यात् “शर्म सुखनाम” [निघं० ३।६] (गहनं गभीरम्-अम्भः किम्-आसीत्) गहनं गम्भीरं सूक्ष्मं जलमपि किं स्यादर्थान्नासीत्, यतो भोग्यं वस्तूत्पद्येत् यस्मिन् सृष्टिबीजमीश्वरो-ऽवसृजेत् “अप एव सर्सजादौ तासु बीजमवासृजत्” [मनु० १।८] ॥१॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - It was neither a-sat nor sat, neither non-existence nor positive existence, then, nothing tangible, neither particles nor sky nor space nor anything beyond. What form? What content? None. Where? What purpose, for whom? What mist? What deep darkness? None, nothing, and yet not nothing.$(It was the zero state of existence after the completion of one cycle and before the beginning of the next cycle, like the zero hour between two dates. It is a state intangible and inexplicable because thought and language too terminate into the intangible and inexplicable silence at the completion of the cycle. The zero hour exists and yet it does not, it doesn’t exist and yet it does, that’s the mystery of it. The state under meditation in this sukta is the hour of Infinity in the womb of Infinity self-brooding on the zero; the One upon the zero.)