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निर्मा॑या उ॒ त्ये असु॑रा अभूव॒न्त्वं च॑ मा वरुण का॒मया॑से । ऋ॒तेन॑ राज॒न्ननृ॑तं विवि॒ञ्चन्मम॑ रा॒ष्ट्रस्याधि॑पत्य॒मेहि॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

nirmāyā u tye asurā abhūvan tvaṁ ca mā varuṇa kāmayāse | ṛtena rājann anṛtaṁ viviñcan mama rāṣṭrasyādhipatyam ehi ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

निःऽमा॑याः । ऊँ॒ इति॑ । त्ये । असु॑राः । अ॒भू॒व॒न् । त्वम् । च॒ । मा॒ । व॒रु॒ण॒ । का॒मया॑से । ऋ॒तेन॑ । रा॒ज॒न् । अनृ॑तम् । वि॒ऽवि॒ञ्चन् । मम॑ । रा॒ष्ट्रस्य॑ । अधि॑ऽपत्यम् । आ । इ॒हि॒ ॥ १०.१२४.५

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:124» मन्त्र:5 | अष्टक:8» अध्याय:7» वर्ग:9» मन्त्र:5 | मण्डल:10» अनुवाक:10» मन्त्र:5


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (त्ये-उ-असुराः) वे प्राणों-इन्द्रियों में रमण करनेवाले कामभाव विषय (निर्मायाः-अभूवन्) प्रज्ञारहित-रुचिरहित हो जावें (वरुण) हे प्राण ! तू (त्वं च) तू भी (कामयासे) नहीं काङ्क्षा करता है। ऐसा तू कर कि (राजन्) हे राजा के समान अधिकारकर्ता ! (ऋतेन-अनृतं विविञ्चन्) ज्ञान से ज्ञान प्राप्त करके असत्य शरीर को पृथक् कर (मम राष्ट्रस्य) मेरे स्वतन्त्रतारूप राष्ट्र के (आधिपत्यम् एहि) स्वामित्व को प्राप्त कर, यहाँ शरीर का अधिपति है, वहाँ मोक्ष में साङ्कल्पिक प्राण होकर आधिपत्य स्वामित्व कर ॥५॥
भावार्थभाषाः - शरीर में काम सांसारिक भोग नहीं चाहते हैं, मोक्ष को चाहते हैं, जहाँ आत्मा का स्वतन्त्र राज्य है, साङ्कल्पिक शरीर है ॥५॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रभु के शासन में

पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत मन्त्र के अनुसार जब मैं प्रभु का वरण करता हुआ गति करता हूँ, उस समय (त्ये) = वे (असुरा) = आसुरभाव (उ) = निश्चय से (निर्माया:) = माया से रहित (अभूवन्) = हो जाते हैं, इनकी माया का प्रभाव मेरे पर नहीं होता (च) = और हे (वरुण) = सब पापों का निवारण करनेवाले प्रभो ! (त्वम्) = आप (मा कामयासे) = मुझे चाहते हैं, मैं आपका प्रिय होता हूँ। जब आसुरभावों से हम ऊपर उठ जाते हैं तो प्रभु के प्रिय तो बनते ही हैं । [२] हे राजन्! मेरे जीवन राज्य के अधिपति प्रभो ! (ऋतेन अनृतं विविञ्चन्) = ऋत से अनृत को पृथक् करते हुए आप (मम) = मेरे (राष्ट्रस्य) = राष्ट्र के (अधिपत्यम्) = स्वामित्व को (एहि) = प्राप्त होइये। मेरे जीवन की प्रत्येक क्रिया आपके आदेश से हो। इस जीवन में अनृत का प्रवेश न हो, ऋत ही ऋत का समावेश हो ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- मैं प्रभु का वरण करूँ। आसुरभाव मायाशून्य हो जाएँ। मेरे जीवन - राज्य का अधिपति प्रभु हो ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (त्ये-उ-असुराः) ते खलु असुषु प्राणेषु खल्विन्द्रियेषु रममाणाः कामा विषयाः (निर्मायाः-अभूवन्) प्रज्ञारहिता न तेषु मम प्रज्ञा बुद्धिर्यद्वा रुचिरस्ति तथा ते भूता भवन्ति वा (वरुण त्वं च मा कामयासे) हे प्राण ! त्वं च मा काङ्क्षसि, तर्हि त्वमेवं कुरु (राजन्) हे राजेवाधिकारकर्तः ! (ऋतेन-अनृतं विविञ्चन्) सत्यज्ञानेन सत्यज्ञानं प्राप्य तथाऽनृतमसत्यमस्थिरं शरीरं पृथक् कुर्वन् त्यजन् “विचिर् पृथग्भावे [रुधादि०] त्यक्त्वेत्यर्थः (मम राष्ट्रस्य-आधिपत्यम्-एहि) मम स्वतन्त्रतारूपस्य राष्ट्रस्य स्वामित्वं प्राप्नुहि, अत्र शरीरस्याधिपतिरसि मोक्षे साङ्कल्पिकः प्राणो भूत्वाऽऽधिपत्यं कुरु ॥५॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - When I get the freedom of my state of being, let the demonic forces be void of their powers, and O Varuna, lord of love, justice and fulfilment, pray bless me with love and protection. O ruling lord of existence, eliminating untruth by the rule of truth and divine law, come and take over the ultimate sovereignty of my free state.