पदार्थान्वयभाषाः - [१] हम इस पृथिवी पर रहते हैं । यह पृथिवी भी संसार वृक्ष की एक शाखा है। दूसरी शाखा द्युलोक है । इस द्युलोक रूप शाखा में निरन्तर गति करनेवाला अतिथि सूर्य है । उस सूर्य से मनुष्य गति का पाठ पढ़ता है, क्रियाशील बनकर सूर्य की तरह ही चमकता है । (अन्यस्याः वयाया:) = दूसरी द्युलोक रूप शाखा के (अतिथिम्) = अतिथिवत् सूर्य को, निरन्तर गतिवाले सूर्य को [अत सातत्यगमने] पश्यन् देखता हुआ एक उपासक ऋतस्य ऋत के [ऋ गतौ] नियमपूर्वक गति के (पुरूणि) = पालक व पूरक (धाम) = तेजों को (विमिमे) = अपने अन्दर निर्मित करता है । सब कार्यों को सूर्य की तरह निरन्तर व नियमित गति से करने से मनुष्य सूर्य की तरह ही तेजस्वी बनता है । [२] मैं (असुराय) = प्राणशक्ति को देनेवाले [ असून् राति] पित्रे उस रक्षक पिता के लिए, उस प्रभु की प्राप्ति के लिए (शेवं शंसामि) = आनन्द व मनःप्रसाद की याचना करता हूँ । मनः प्रसाद रूप तप से ही तो मैं उस प्रभु को पानेवाला बनूँगा। (अयज्ञियात्) = अयज्ञिय कर्मों को छोड़कर स्वार्थमय कर्मों से ऊपर उठकर (यज्ञियं भागम्) = पवित्र कर्मों के सेवन को एमि प्राप्त होता हूँ । अपने जीवन को यज्ञिय बनाता हूँ । इस यज्ञ के द्वारा ही तो मैं उस पिता का आराधन कर सकूँगा । 'यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवाः ' ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- मैं सूर्य को देखता हुआ सूर्य की तरह निरन्तर नियमित गतिवाला होकर तेजस्वी बनूँ । प्रभु प्राप्ति के लिए मनः प्रसाद रूप तप का साधन करूँ । यज्ञशील बनूँ ।