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देवता: अग्निः ऋषि: अग्निः छन्द: त्रिष्टुप् स्वर: धैवतः

पश्य॑न्न॒न्यस्या॒ अति॑थिं व॒याया॑ ऋ॒तस्य॒ धाम॒ वि मि॑मे पु॒रूणि॑ । शंसा॑मि पि॒त्रे असु॑राय॒ शेव॑मयज्ञि॒याद्य॒ज्ञियं॑ भा॒गमे॑मि ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

paśyann anyasyā atithiṁ vayāyā ṛtasya dhāma vi mime purūṇi | śaṁsāmi pitre asurāya śevam ayajñiyād yajñiyam bhāgam emi ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

पश्य॑न् । अ॒न्यस्याः॑ । अति॑थिम् । व॒यायाः॑ । ऋ॒तस्य॑ । धाम॑ । वि । मि॒मे॒ । पु॒रूणि॑ । शंसा॑मि । पि॒त्रे । असु॑राय । शेव॑म् । अ॒य॒ज्ञि॒यात् । य॒ज्ञिय॑म् । भा॒गम् । ए॒मि॒ ॥ १०.१२४.३

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:124» मन्त्र:3 | अष्टक:8» अध्याय:7» वर्ग:9» मन्त्र:3 | मण्डल:10» अनुवाक:10» मन्त्र:3


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अन्यस्याः वयायाः) अन्य प्राणपद मुक्तिरूप शाखा के (अतिथिं पश्यन्) निरन्तर प्रापणशील परमात्मा को इधर की सृष्टिरूप शाखा में स्थित मैं आत्मा देखता हूँ (ऋतस्य पुरूणि धाम) अमृत सुख भरे अङ्गों को (विममे) विशिष्टता से निर्माण करता हूँ (असुराय पित्रे) प्राणप्रद पिता को (शंसामि) स्तुति करता हूँ (अयज्ञियात्) असङ्गमनीय जड़ संसार से (यज्ञियं भागं शेवम्-एमि) यज्ञिय सङ्गमनीय भजनीय अपने जैसे चेतन सुखरूप परमात्मा को प्राप्त होता हूँ ॥३॥
भावार्थभाषाः - सृष्टिरूप भोगमयी शाखा को छोड़कर मुक्तिरूप स्थिर जीवन देनेवाली शाखा में अमृत भोग है, वहाँ सङ्कल्पात्मक अभौतिक अङ्गों से सुख भोगा जाता है, अपने जैसे चेतन परमात्मा के आश्रय उसे प्राप्त करना चाहिये ॥३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सूर्य शिष्यता

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हम इस पृथिवी पर रहते हैं । यह पृथिवी भी संसार वृक्ष की एक शाखा है। दूसरी शाखा द्युलोक है । इस द्युलोक रूप शाखा में निरन्तर गति करनेवाला अतिथि सूर्य है । उस सूर्य से मनुष्य गति का पाठ पढ़ता है, क्रियाशील बनकर सूर्य की तरह ही चमकता है । (अन्यस्याः वयाया:) = दूसरी द्युलोक रूप शाखा के (अतिथिम्) = अतिथिवत् सूर्य को, निरन्तर गतिवाले सूर्य को [अत सातत्यगमने] पश्यन् देखता हुआ एक उपासक ऋतस्य ऋत के [ऋ गतौ] नियमपूर्वक गति के (पुरूणि) = पालक व पूरक (धाम) = तेजों को (विमिमे) = अपने अन्दर निर्मित करता है । सब कार्यों को सूर्य की तरह निरन्तर व नियमित गति से करने से मनुष्य सूर्य की तरह ही तेजस्वी बनता है । [२] मैं (असुराय) = प्राणशक्ति को देनेवाले [ असून् राति] पित्रे उस रक्षक पिता के लिए, उस प्रभु की प्राप्ति के लिए (शेवं शंसामि) = आनन्द व मनःप्रसाद की याचना करता हूँ । मनः प्रसाद रूप तप से ही तो मैं उस प्रभु को पानेवाला बनूँगा। (अयज्ञियात्) = अयज्ञिय कर्मों को छोड़कर स्वार्थमय कर्मों से ऊपर उठकर (यज्ञियं भागम्) = पवित्र कर्मों के सेवन को एमि प्राप्त होता हूँ । अपने जीवन को यज्ञिय बनाता हूँ । इस यज्ञ के द्वारा ही तो मैं उस पिता का आराधन कर सकूँगा । 'यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवाः ' ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- मैं सूर्य को देखता हुआ सूर्य की तरह निरन्तर नियमित गतिवाला होकर तेजस्वी बनूँ । प्रभु प्राप्ति के लिए मनः प्रसाद रूप तप का साधन करूँ । यज्ञशील बनूँ ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अन्यस्याः वयाया-अतिथिं पश्यन्) भिन्नायाः प्राणप्रदायाः मुक्तिरूपायाः शाखायाः “वयाः शाखा” [निरु० १।४] “वया शाखाः [ऋ० २।३५।८ दयानन्दः] निरन्तरं प्रापणशीलं परमात्मान-महमत्रत्यायां शाखायां सृष्टौ स्थितमहमात्मा पश्यामि (ऋतस्य पुरूणि धाम वि ममे) यः परमात्मा खल्वमृतस्य” “ऋतममृतमित्याहुः” [जै० २।१७] “बहूनि ह्यङ्गानि” “अङ्गानि वै धामानि” [श० ३।३।४।१४] विशिष्टतया मिमीते “शृण्वन् श्रोत्रं मन्वानो मनो भवति” [शतपथ १४।४।२।१७] सङ्कल्पात्मकानि निर्माति (असुराय पित्रे शंसामि) तं स्थिरप्राणप्रदं पितरम् “द्वितीयास्थाने चतुर्थी व्यत्ययेन” स्तौमि (अयज्ञियात्-यज्ञियं भागं शेवम्-एमि) असङ्गमनीयाद् जडात् संसारात् स्वसदृशं चेतनं सङ्गमनीयं भजनीयं सुखरूपं परमात्मानं प्राप्नोमि ॥३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Watching the traveller of another path of life other than the physical, the bird on another branch of the tree, and seeing the original home of the cosmic yajna, I enact many vedis to follow the yajnic paths of living. I sing songs of homage in honour of the omnipotent father giver of life and take to my share of yajnic living, away from the selfish ways of existence.