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ऊ॒र्ध्वो ग॑न्ध॒र्वो अधि॒ नाके॑ अस्थात्प्र॒त्यङ्चि॒त्रा बिभ्र॑द॒स्यायु॑धानि । वसा॑नो॒ अत्कं॑ सुर॒भिं दृ॒शे कं स्व१॒॑र्ण नाम॑ जनत प्रि॒याणि॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ūrdhvo gandharvo adhi nāke asthāt pratyaṅ citrā bibhrad asyāyudhāni | vasāno atkaṁ surabhiṁ dṛśe kaṁ svar ṇa nāma janata priyāṇi ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ऊ॒र्ध्वः । ग॒न्ध॒र्वः । अधि॑ । नाके॑ । अ॒स्था॒त् । प्र॒त्यङ् । चि॒त्रा । बिभ्र॑त् । अ॒स्य॒ । आयु॑धानि । वसा॑नः । अत्क॑म् । सु॒ऽर॒भिम् । दृ॒शे । कम् । स्वः॑ । ण । नाम॑ । ज॒न॒त॒ । प्रि॒याणि॑ ॥ १०.१२३.७

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:123» मन्त्र:7 | अष्टक:8» अध्याय:7» वर्ग:8» मन्त्र:2 | मण्डल:10» अनुवाक:10» मन्त्र:7


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (गन्धर्वः) पृथिवी आदि लोकों का धारणकर्त्ता परमात्मा (ऊर्ध्वः) उत्कृष्ट (नाके-अधि) मोक्ष में (अस्थात्) स्वरूप से विराजमान है (अस्य चित्रा-आयुधानि) यह विचित्र शस्त्रों को (बिभ्रत्) धारण करता है (सुरभिम् अत्कं वसानः) सुगन्धयुक्त वज्र को आच्छादित करता हुआ (कं दृशे) सुख को दिखाने के लिये है (प्रियाणि स्वः-न नाम) रुचिकर सुखविशेष सम्प्रति अवश्य (जनत) उत्पन्न करता है ॥७॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा पृथिवी आदि लोकों को धारण कर रहा है, स्वरूपतः मोक्षधाम साक्षात् होता है, इसके शस्त्र विचित्र हैं, सुगन्धयुक्त मीठे वज्र को गुप्तरूप में रखता है, सुख दिखाने के लिये उत्पन्न करता है ॥७॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

ब्रह्म रूप कवच का धारण

पदार्थान्वयभाषाः - [३] गत मन्त्र के अनुसार प्रभु का दर्शन करनेवाला (ऊर्ध्वः) = ऊपर उठता है, विषयों में कभी फँसता नहीं । (गन्धर्वः) = यह ज्ञान की वाणियों का धारण करनेवाला होता है । (नाके अधि अस्थात्) = मोक्ष सुख में स्थित होता है, शरीर छूटने से पूर्व भी जीवन्मुक्त अवस्था में होता है । [२] यह जीवन्मुक्त (प्रत्यङ्) = अपने अन्दर (अस्य) = इस प्रभु के, प्रभु से दिये हुए (चित्रा आयुधानि) = अद्भुत आयुधों को, इन्द्रिय, मन व बुद्धि को (बिभ्रत्) = धारण करता है। [३] (अत्कम्) = प्रभु रूप कवच को [ब्रह्म वर्म ममान्तरम्] (वसानः) = यह धारण करता है। यह कवच (सुरभिम्) = शोभन व सुन्दर है अथवा [सु-रभ] हमें सदा शुभ कर्मों में प्रवृत्त करनेवाला है । यह अन्ततः उस (कम्) = आनन्दमय प्रभु के दृशे दर्शन के लिए होता है । [४] इस प्रभु रूप कवच को धारण करके यह व्यक्ति (स्वः न) = सूर्य की तरह (प्रियाणि नाम जनत) = प्रिय कर्मों को ही प्रकट करता है। सूर्य सदा प्रकाश को करता है, यह भी प्रकाशमय उत्कृष्ट कर्मों को ही करता है । ब्रह्मरूप कवच को धारण करने पर इसके जीवन से अशुभ कर्म होते ही नहीं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- ब्रह्मरूप कवच को धारण करके हम सदा शुभ कर्मों को ही करनेवाले बनें ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (गन्धर्वः) गाः पृथिव्यादीन् लोकान् धरति यः स परमात्मा (ऊर्ध्वः) उत्कृष्टः (नाके-अधि) मोक्षे (अस्थात्) स्वरूपस्तिष्ठति-विराजते (अस्य चित्रा-आयुधानि) अयम् “प्रथमास्थाने षष्ठी व्यत्ययेन” परमात्मा विचित्राणि शस्त्राणि (बिभ्रत्) बिभर्ति-धारयति (सुरभिम्-अत्कम्) सुगन्धं वज्रमस्ति ‘अत्कं वज्रनाम’ [निघ० २।२०] (वसानः) आच्छादयन् (कं दृशे) सुखं द्रष्टुं (प्रियाणि स्वः-न नाम) प्रियाणि सुखानि सम्प्रति (जनत) जनयति ॥७॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - High up over there abides the sun in the region of heavenly light. It bears wondrous weapons of divinity such as thunder and lightning. It wears a beautiful, fragrant form soothing for people to see, and like the light and bliss of heaven creates divine waters and many other dear divine gifts for life.