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अ॒प्स॒रा जा॒रमु॑पसिष्मिया॒णा योषा॑ बिभर्ति पर॒मे व्यो॑मन् । चर॑त्प्रि॒यस्य॒ योनि॑षु प्रि॒यः सन्त्सीद॑त्प॒क्षे हि॑र॒ण्यये॒ स वे॒नः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

apsarā jāram upasiṣmiyāṇā yoṣā bibharti parame vyoman | carat priyasya yoniṣu priyaḥ san sīdat pakṣe hiraṇyaye sa venaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒प्स॒राः । जा॒रम् । उ॒प॒ऽसि॒ष्मि॒या॒णा । योषा॑ । बि॒भ॒र्ति॒ । प॒र॒मे । विऽओ॑मन् । चर॑त् । प्रि॒यस्य॑ । योनि॑षु । प्रि॒यः । सन् । सीद॑त् । प॒क्षे । हि॒र॒ण्यये॑ । सः । वे॒नः ॥ १०.१२३.५

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:123» मन्त्र:5 | अष्टक:8» अध्याय:7» वर्ग:7» मन्त्र:5 | मण्डल:10» अनुवाक:10» मन्त्र:5


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अप्सराः) आप्त पुरुषों में प्राप्त-होनेवाली स्तुतिवाणी (उपसिष्मियाणा योषा) कुछ हँसती हुई स्त्री सी (परमे व्योमन्) परम विशिष्ट रक्षक हृदयावकाश में (जारम्) स्तोतव्य या दुःखहर्त्ता परमात्मा को (बिभर्ति) धारण करती है (प्रियस्य-योनिषु) जैसे प्रिय मित्र के घरों में (प्रियः सन् चरत्) प्रिय सखा होता हुआ विचरता है प्राप्त होता है, वैसे (सः-वेनः) वह कमनीय परमात्मा (हिरण्ये पक्षे) ज्योतिर्मय हृदय-में (सीदत्) प्राप्त होता है ॥५॥
भावार्थभाषाः - आप्त पुरुषों में प्राप्तव्य स्तुति हृदय के अन्दर स्तुति करने योग्य दुःखहर्त्ता परमात्मा को धारण कराती है, जो आत्मा का घर है, जैसे मित्र के घरों में मित्र प्राप्त होता है, ऐसे परमात्मा जीवात्मा के घर में प्राप्त होता है ॥५॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अप्सरा का स्मित

पदार्थान्वयभाषाः - [१] प्रस्तुत मन्त्र में वेदवाणी को 'अप्सरा' कहा है यह 'अप्सु सारयति'- कर्मों में प्रेरित करती है । यह 'योषा' है गुणों के साथ हमारा सम्पर्क करती है, अवगुणों से हमें पृथक् करती है। 'जार' वह व्यक्ति है जो कि अपने दोषों को प्रभु-स्तवन द्वारा जीर्ण करने का प्रयत्न करता है। यह (अप्सराः) = कर्मों में प्रेरित करनेवाली (योषा) = गुणों से सम्पृक्त व अवगुणों से असम्पृक्त करनेवाली वेदवाणी (जारम्) = स्तोता के (उप) = समीप (सिष्मियाणा) - मुस्कराती हुई, अर्थात् उसके प्रति अपने स्वरूप को व्यक्त करती हुई उसे (परमे व्योमन्) = सर्वोत्कृष्ट आकाशवत् व्यापक ब्रह्म में बिभर्ति धारण करती है। उस ब्रह्म में धारण करती है जो 'व्योमन्' = वी+ओम्+अन् = रक्षक होते हुए एक ओर प्रकृति [वी] को धारण किए हुए हैं तो दूसरी ओर जीव [अन्] को । [२] यह व्यक्ति (प्रियः सन्) = प्रभु का प्रिय होता हुआ (प्रियस्य योनिषु) = [योनि = any place of birth] उस प्रिय प्रभु के उत्पत्ति-स्थानों में (चरत्) = विचरता है। ऐसे स्थानों में विचरण करता है जहाँ कि उसे प्रभु की विभूति दिखे और प्रभु का स्मरण हो । [३] (सः वेन:) = वह मेधावी पुरुष (हिरण्यये पक्षे) = ज्योतिर्मय पक्ष में (सीदत्) = आसीन होता है। देवों का एक पक्ष है, असुरों का दूसरा । देवों का पक्ष ज्योतिर्मय है, असुरों का अन्धकारमय । यह देव पक्ष को स्वीकार करता है। श्रेय और प्रेय में से श्रेय का वरण । करता है
भावार्थभाषाः - भावार्थ-स्तोता को वेदवाणी का प्रकाश मिलता है। यह सर्वत्र प्रभु की विभूति को देखता हुआ देवों के ज्योतिर्मय पक्ष को स्वीकार करता है, देव बनने के लिए यत्नशील होता है ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अप्सराः) आप्तेषु सरति या स्तुतिवाक् (उपसिष्मियाणा योषा) ईषद्धसन्ती स्त्रीव (परमे-व्योमन्) परमे विशिष्टरक्षके हृदयावकाशे (जारं बिभर्ति) स्तोतव्यं दुःखहन्तारं वा “जरति अर्चतिकर्मा” [निघ० ३।१४] “जारः-दुःखहन्ता” [ऋ० १।५९।५ दयानन्दः] परमात्मानं धारयति प्रापयति “अन्तर्गतणिजर्थः” (प्रियस्य योनिषु प्रियः-सन् चरत्) यथा प्रियस्य सख्युर्गृहेषु प्रियः-सखा सन् चरति प्राप्नोति तथा (सः-वेनः-हिरण्यये-पक्षे सीदत्) स कमनीयः परमात्मा हिरण्मये ज्योतिर्मये स्थाने हृदये “अष्टाचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या। तस्यां हिरण्ययः कोशः स्वर्गो ज्योतिषाऽऽवृतः” [अथर्व० १०।२।३१] सीदति प्राप्नोति ॥५॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Like a youthful belle holding on to her lover, the lightning with a brilliant smile holds on to and sustains with the cloud in the highest skies, and the cloud too, dear and lovely, moving about in the spatial home of his lovely light and lightning, stays by the side of the golden beloved.