पदार्थान्वयभाषाः - [१] प्रस्तुत मन्त्र में वेदवाणी को 'अप्सरा' कहा है यह 'अप्सु सारयति'- कर्मों में प्रेरित करती है । यह 'योषा' है गुणों के साथ हमारा सम्पर्क करती है, अवगुणों से हमें पृथक् करती है। 'जार' वह व्यक्ति है जो कि अपने दोषों को प्रभु-स्तवन द्वारा जीर्ण करने का प्रयत्न करता है। यह (अप्सराः) = कर्मों में प्रेरित करनेवाली (योषा) = गुणों से सम्पृक्त व अवगुणों से असम्पृक्त करनेवाली वेदवाणी (जारम्) = स्तोता के (उप) = समीप (सिष्मियाणा) - मुस्कराती हुई, अर्थात् उसके प्रति अपने स्वरूप को व्यक्त करती हुई उसे (परमे व्योमन्) = सर्वोत्कृष्ट आकाशवत् व्यापक ब्रह्म में बिभर्ति धारण करती है। उस ब्रह्म में धारण करती है जो 'व्योमन्' = वी+ओम्+अन् = रक्षक होते हुए एक ओर प्रकृति [वी] को धारण किए हुए हैं तो दूसरी ओर जीव [अन्] को । [२] यह व्यक्ति (प्रियः सन्) = प्रभु का प्रिय होता हुआ (प्रियस्य योनिषु) = [योनि = any place of birth] उस प्रिय प्रभु के उत्पत्ति-स्थानों में (चरत्) = विचरता है। ऐसे स्थानों में विचरण करता है जहाँ कि उसे प्रभु की विभूति दिखे और प्रभु का स्मरण हो । [३] (सः वेन:) = वह मेधावी पुरुष (हिरण्यये पक्षे) = ज्योतिर्मय पक्ष में (सीदत्) = आसीन होता है। देवों का एक पक्ष है, असुरों का दूसरा । देवों का पक्ष ज्योतिर्मय है, असुरों का अन्धकारमय । यह देव पक्ष को स्वीकार करता है। श्रेय और प्रेय में से श्रेय का वरण । करता है
भावार्थभाषाः - भावार्थ-स्तोता को वेदवाणी का प्रकाश मिलता है। यह सर्वत्र प्रभु की विभूति को देखता हुआ देवों के ज्योतिर्मय पक्ष को स्वीकार करता है, देव बनने के लिए यत्नशील होता है ।