पदार्थान्वयभाषाः - [१] (विप्राः) = ज्ञानी लोग, ज्ञान के द्वारा अपनी न्यूनताओं को दूर करनेवाले लोग (रूपं जानन्तः) = प्रभु के रूप को जानते हुए (अकृपन्तः) = [to havemercy for ] दया के स्वभाववाले बनते हैं। प्रभु दयालु हैं, ये भी दया को अपनाते हैं । [२] (हि) = निश्चय से (मृगस्य) = [मार्ष्ट: नि० १। २०] मानव - जीवनों को शुद्ध करनेवाले (महिषस्य) = पूज्य [मह पूजायाम्] प्रभु की (घोषम्) = अन्त: प्रेरणा को (ग्मन्) = प्राप्त होते हैं । प्रभु की वाणियों को प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं । [३] इन वाणियों से प्रेरणा को लेकर (ऋतेन यन्तः) = ऋत से गति करते हुए, अर्थात् सब कार्यों को नियम से करते हुए (सिन्धुं अधि अस्थुः) = उस ज्ञान समुद्र प्रभु में स्थित होते हैं। प्रभु-स्मरणपूर्वक सब कार्यों को करनेवाले होते हैं। [३] (गन्धर्वः) = यह ज्ञान की वाणियों को धारण करनेवाला (अमृतानि) = अमृतत्वों को (नाम) = निश्चय से (वि दत्) = प्राप्त करता है। [नाम इति वाक्यालंकारे] । 'नाम' शब्द का अर्थ नमनशील उदक भी है। यह गन्धर्व अमृतत्वों को प्राप्त करता है। और अमृतत्व के लिए ही इन रेतः कणरूप उदकों को प्राप्त करता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु के जानते हुए हम अपने जीवनों को शुद्ध बनायें । ज्ञान की वाणियों को धारण करते हुए अमृतत्व को प्राप्त करें ।