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यश्चि॒दापो॑ महि॒ना प॒र्यप॑श्य॒द्दक्षं॒ दधा॑ना ज॒नय॑न्तीर्य॒ज्ञम् । यो दे॒वेष्वधि॑ दे॒व एक॒ आसी॒त्कस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yaś cid āpo mahinā paryapaśyad dakṣaṁ dadhānā janayantīr yajñam | yo deveṣv adhi deva eka āsīt kasmai devāya haviṣā vidhema ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यः । चि॒त् । आपः॑ । म॒हि॒ना । प॒रि॒ऽअप॑श्यत् । दक्ष॑म् । दधा॑नाः । ज॒नय॑न्तीः । य॒ज्ञम् । यः । दे॒वेषु॑ । अधि॑ । दे॒वः । एकः॑ । आसी॑त् । कस्मै॑ । दे॒वाय॑ । ह॒विषा॑ । वि॒धे॒म॒ ॥ १०.१२१.८

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:121» मन्त्र:8 | अष्टक:8» अध्याय:7» वर्ग:4» मन्त्र:3 | मण्डल:10» अनुवाक:10» मन्त्र:8


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (यः-चित्) जो भी (महिना) अपने महत्त्व से (यज्ञं जनयन्तीः) सृष्टियज्ञ को-प्रकट करने के हेतु (दक्षं दधानाः) बल वेग धारण करते हुए (आपः) अप्तत्त्व-परमाणुओं को (यः-परि-अपश्यत्) जो सब ओर से देखता है जानता है (देवेषु-अधि देवः-एकः) देवों के ऊपर एक देव परमात्मा है (कस्मै…) पूर्ववत् ॥८॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा अपने महत्त्व से सृष्टियज्ञ के प्रारम्भ करनेवाले परमाणुओं को भलीभाँति जानता है, जो सब देवों के ऊपर अधिष्ठाता होकर वर्त्तमान है, उस सुखस्वरूप प्रजापति के लिये उपहाररूप से अपनी आत्मा को समर्पित करना चाहिये ॥८॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अधिदेव

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यः) = जो (चित्) = निश्चय से (महिनः) = अपनी महिमा से (दक्षं दधानाः) = सम्पूर्ण [ growth] विकास व उन्नति को धारण करते हुए, यज्ञं (जनयन्ती:) = इस सृष्टियज्ञ को जन्म देते हुए [यज= संगतिकरण] 'सत्त्व, रज, तम' के संगतिकरण रूप संसार को जन्म देते हुए (आपः) = व्यापक महत् तत्त्व को पर्यपश्यत् सम्यक्तया देखता है, इसका अधिष्ठातृत्व करता है। अर्थात् जिसकी अध्यक्षता में ही यह महत् तत्त्व सब भूतों को जन्म देता है । [२] (यः) = जो (देवेषु) = सूर्य आदि सब देवों में (एक:) = अद्वितीय (अधि देवः) = अधिष्ठातृदेव (आसीत्) = है, जो इन सूर्यादि देवों को देवत्व प्राप्त करा रहा है। उस (कस्मै) = आनन्दमय (देवाय) = सब कुछ देनेवाले प्रभु के लिए (हविषा) = दानपूर्वक अदन द्वारा (विधेम) = पूजा को करें।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु के अधिष्ठातृत्व में ही महत्तत्त्व सब भूतों को जन्म देता है । वे प्रभु ही सूर्यादि देवों को देवत्व प्राप्त कराते हैं ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (यः-चित्) योऽपि (महिना) स्वमहत्त्वेन (यज्ञं जनयन्तीः) सृष्टियज्ञं प्रकटयन्तीः-प्रकटीकरणहेतोः लक्षणहेत्वोः क्रियायाः” [अष्टा० ३।२।१२६] (दक्षं दधानाः-आपः-परि-अपश्यत्) बलं वेगम् “दक्षः-बलनाम” [निघ० २।९] धारयमाणान्-अपपदार्थान् “आप” द्वितीयार्थे प्रथमा व्यत्ययेन परितः पश्यति (यः-देवेषु-अधि देवः-एकः) यो देवेषु खलूपरि देव एक एवास्ति (कस्मै....) पूर्ववत् ॥८॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - The one who with his might pervades, watches and overall controls the ocean of charged particles of Vayu energy bearing the heat mode producing the yajnic process of life’s evolution, who is on top of all the divinities of existence, that One supreme lord let us worship with havis.