पदार्थान्वयभाषाः - [१] सृष्टि के प्रारम्भ में प्रकृति का पहला परिणाम 'महत् तत्त्व' कहलाता है। यह सारा संसार इस महत् तत्त्व के गर्भ में होता है। यह एक homogeneons - सम अवस्था में स्थित (नभ) = बादल के समान होता है। यहाँ इसे व्यापक-सा होने के कारण 'आप' [आप् व्याप्तौ] नाम दिया गया है । (यद्) = जब (ह) = निश्चय से (विश्वं गर्भं दधानाः) = सम्पूर्ण संसार को अपने अन्दर धारण करते हुए (अग्निं जयन्ती:) = अग्नि आदि तत्त्वों को जन्म देनेवाले (बृहती: आप:) = ये विशाल (आप:) = अथवा महत्तत्त्व (आयन्) = गतिवाले होते हैं (ततः) = तब (देवानाम्) = उत्पन्न होनेवाले सूर्यादि देवों का वह प्रभु ही (एकः असुः समवर्तत) = अद्वितीय प्राण होता है। प्रभु ही सब देवों को देवत्व प्राप्त कराते हैं। सूर्य में प्रभा को वे ही स्थापित करते हैं, जलों में रस को तथा पृथिवी में गन्ध को स्थापित करनेवाले वे ही हैं । [२] इस (कस्मै) = आनन्दस्वरूप देवाय सब कुछ देनेवाले परमात्मा के लिए (हविषा) = दानपूर्वक अदन से (विधेम) = हम पूजा करनेवाले हों। ये प्रभु ही सब देवों को देवत्व प्राप्त कराते हैं। इन्हीं से मुझे भी देवत्व की प्राप्ति होगी। जितना जितना मैं त्याग करूँगा, उतना उतना ही प्रभु के समीप होता जाऊँगा। जितना जितना प्रभु के समीप हूँगा, उतना उतना चमकता चलूँगा ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- 'महद् ब्रह्म' उस प्रभु की योनि है । प्रभी की अध्यक्षता में इस महद् ब्रह्म से सम्पूर्ण भूतों की उत्पत्ति होती है। इन सबको देवत्व प्रभु ही प्राप्त कराते हैं ।