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आपो॑ ह॒ यद्बृ॑ह॒तीर्विश्व॒माय॒न्गर्भं॒ दधा॑ना ज॒नय॑न्तीर॒ग्निम् । ततो॑ दे॒वानां॒ सम॑वर्त॒तासु॒रेक॒: कस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

āpo ha yad bṛhatīr viśvam āyan garbhaṁ dadhānā janayantīr agnim | tato devānāṁ sam avartatāsur ekaḥ kasmai devāya haviṣā vidhema ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आपः॑ । ह॒ । यत् । बृ॒ह॒तीः । विश्व॑म् । आय॑न् । गर्भ॑म् । दधा॑नाः । ज॒नय॑न्तीः । अ॒ग्निम् । ततः॑ । दे॒वाना॑म् । सम् । अ॒व॒र्त॒त॒ । असुः॑ । एकः॑ । कस्मै॑ । दे॒वाय॑ । ह॒विषा॑ । वि॒धे॒म॒ ॥ १०.१२१.७

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:121» मन्त्र:7 | अष्टक:8» अध्याय:7» वर्ग:4» मन्त्र:2 | मण्डल:10» अनुवाक:10» मन्त्र:7


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (बृहतीः-आपः-ह) सृष्टि के आदि में महान् अप्तत्त्वप्रवाह व्याप्त परमाणु (अग्निं जनयन्तीः) आग्नेय पदार्थों को उत्पन्न करने हेतु (गर्भं दधानाः) अपने अन्दर धारण करते हुए (विश्वम्-आयन्) विश्व के प्रति प्रकट होते हैं (ततः) पुनः (देवानाम्-असुः) समस्त देवों का प्राणभूत (एकः समवर्तत) एक देव परमात्मा वर्त्तमान था (कस्मै…) पूर्ववत् ॥७॥
भावार्थभाषाः - सृष्टि के आरम्भ में परमाणु प्रवाह आग्नेय तत्त्व को अपने अन्दर धारण करता हुआ प्रकट होता है, तब स्वामीरूप से वर्त्तमान सब देवों का देव परमात्मा वर्तमान था, उस सुखस्वरूप प्रजापति के लिये उपहारस्वरूप अपने आत्मा को समर्पित करना चाहिये ॥७॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

बृहती: आपः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] सृष्टि के प्रारम्भ में प्रकृति का पहला परिणाम 'महत् तत्त्व' कहलाता है। यह सारा संसार इस महत् तत्त्व के गर्भ में होता है। यह एक homogeneons - सम अवस्था में स्थित (नभ) = बादल के समान होता है। यहाँ इसे व्यापक-सा होने के कारण 'आप' [आप् व्याप्तौ] नाम दिया गया है । (यद्) = जब (ह) = निश्चय से (विश्वं गर्भं दधानाः) = सम्पूर्ण संसार को अपने अन्दर धारण करते हुए (अग्निं जयन्ती:) = अग्नि आदि तत्त्वों को जन्म देनेवाले (बृहती: आप:) = ये विशाल (आप:) = अथवा महत्तत्त्व (आयन्) = गतिवाले होते हैं (ततः) = तब (देवानाम्) = उत्पन्न होनेवाले सूर्यादि देवों का वह प्रभु ही (एकः असुः समवर्तत) = अद्वितीय प्राण होता है। प्रभु ही सब देवों को देवत्व प्राप्त कराते हैं। सूर्य में प्रभा को वे ही स्थापित करते हैं, जलों में रस को तथा पृथिवी में गन्ध को स्थापित करनेवाले वे ही हैं । [२] इस (कस्मै) = आनन्दस्वरूप देवाय सब कुछ देनेवाले परमात्मा के लिए (हविषा) = दानपूर्वक अदन से (विधेम) = हम पूजा करनेवाले हों। ये प्रभु ही सब देवों को देवत्व प्राप्त कराते हैं। इन्हीं से मुझे भी देवत्व की प्राप्ति होगी। जितना जितना मैं त्याग करूँगा, उतना उतना ही प्रभु के समीप होता जाऊँगा। जितना जितना प्रभु के समीप हूँगा, उतना उतना चमकता चलूँगा ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- 'महद् ब्रह्म' उस प्रभु की योनि है । प्रभी की अध्यक्षता में इस महद् ब्रह्म से सम्पूर्ण भूतों की उत्पत्ति होती है। इन सबको देवत्व प्रभु ही प्राप्त कराते हैं ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (बृहतीः-आपः-ह) सृष्टेरादौ महान्तः खल्वप्तत्त्वप्रवाहाः-आप्ताः परमाणवः खलु “आपो वा इदमग्रे यत्तत्सलिलमासीत्” [जै० उ० १।५६।१] “तम आसीत् तमसा गूढमग्रेऽप्रकेतं सलिलं सर्वमा इदम्” [ऋ० १०।१२९।३] (अग्निं जनयन्तीः-गर्भं दधानाः) अग्निमाग्नेयपदार्थमुत्पादनहेतोर्गर्भं धारयन्तः (विश्वम्-आयन्) विश्वं प्रति प्रकटीभवन्ति (ततः) पुनः (देवानाम्-असुः-एकः-सम् अवर्तत) समस्तदेवानां प्राणरूपः-खल्वेको देवो देवानां देवः परमात्मा वर्त्तमान आसीत् ॥७॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - When the boundless ocean of charged particles of Vayu energy comes into existence bearing the implicit blue print of the cosmos in seed form, creating the heat mode of existence, then the one supreme of the divinities, living breathing life itself, emerges in advance of all cosmic forms, and that One all-comprehensive divine lord let us worship with oblations of havi, who else? That is Hiranyagarbha.