पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यः) = जो प्रभु (प्राणतः) = श्वासोच्छ्वास लेनेवाले प्राणियों तथा (निमिषतः) = आँखों की पलक सदा बन्द किये हुए वनस्पतियों, इस द्विविध (जगतः) = जगत् का (महित्वा) = अपनी महिमा के कारण (एकः इत्) = अकेले ही (राजा बभूव) = शासक हैं। प्रभु सम्पूर्ण चराचर जगत् का, स्थावरजंगम संसार का शासन कर रहे हैं । [२] (यः) = जो (अस्य) = इन (द्विपदः चतुष्पदः) = दो पाँवोंवाले पक्षियों के तथा चार पाँववाले पशुओं के (ईशे) = ईश हैं। इनके अन्दर उस-उस नैपुण्य को स्थापित करनेवाले हैं । मधुमक्षिकाओं को शहद के निर्माण का नैपुण्य प्रभु ही प्राप्त कराते हैं। चील का शान्त परों से उड़ना प्रभु की ही महिमा का द्योतक है। सिंह को अद्भुत तैरने का सामर्थ्य प्रभु ही प्राप्त कराते हैं। इस (कस्मै) = आनन्दस्वरूप (देवाय) = देव के लिए (हविषा) = दानपूर्वक अदन से (विधेम) = हम पूजा करें। इस पूजा के द्वारा हम भी उन्नतिपथ पर आगे बढ़ सकेंगे।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - चराचर जगत् के स्वामी प्रभु ने ही पशु-पक्षियों में अद्भुत नैपुण्यों को स्थापित किया है। उसका पूजन ही हमें भी जीवन मार्ग में उन्नत करता है ।