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ए॒वा म॒हान्बृ॒हद्दि॑वो॒ अथ॒र्वावो॑च॒त्स्वां त॒न्व१॒॑मिन्द्र॑मे॒व । स्वसा॑रो मात॒रिभ्व॑रीररि॒प्रा हि॒न्वन्ति॑ च॒ शव॑सा व॒र्धय॑न्ति च ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

evā mahān bṛhaddivo atharvāvocat svāṁ tanvam indram eva | svasāro mātaribhvarīr ariprā hinvanti ca śavasā vardhayanti ca ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ए॒व । म॒हान् । बृ॒हत्ऽदि॑वः । अथ॑र्वा । अवो॑चत् । स्वाम् । त॒न्व॑म् । इन्द्र॑म् । ए॒व । स्वसा॑रः । मा॒त॒रिभ्व॑रीः । अ॒रि॒प्राः । हि॒न्वन्ति॑ । च॒ । शव॑सा । व॒र्धय॑न्ति च ॥ १०.१२०.९

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:120» मन्त्र:9 | अष्टक:8» अध्याय:7» वर्ग:2» मन्त्र:4 | मण्डल:10» अनुवाक:10» मन्त्र:9


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (एव) इस प्रकार (महान् बृहद्दिवः) महान् विद्यावान् (अथर्वा) स्थिर योगी (स्वां तन्वम्) अपनी विस्तृत स्तुति प्रार्थना को (इन्द्रम्-एव) इन्द्र-ऐश्वर्यवान् परमात्मा के प्रति ही (अवोचत्) बोलता है (स्वसारः) स्वयं सरणशील होती हुयी (मातरिभ्वरीः) जगन्निर्माता परमात्मा में वर्तमान होती हुयी (अरिप्राः) निष्पाप स्तुतिधाराएँ (हिन्वन्ति) परमात्मा को प्रसन्न करती हैं तथा (च) और (शवसा) बल से-प्रभाव से (वर्धयन्ति) स्तुति करनेवाले के अन्दर परमात्मा को साक्षात् कराती हैं ॥९॥
भावार्थभाषाः - महान् विद्वान् अपनी स्तुति प्रार्थना को जब परमात्मा के प्रति अर्पित करता है, तो निष्पाप स्तुतियाँ परमात्मा में आश्रय लेकर उसे प्रभावित करती हैं और स्तुति करनेवाले के अन्दर साक्षात् कराती हैं ॥९॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

मैं 'इन्द्र' ही तो हूँ [यदि वा द्या स्यामहं त्वम्] ए॒वा

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (एवा) = इस प्रकार (महान्) = पूजा की वृत्तिवाला [मह पूजायाम्] (बृहद्दिवः) = उत्कृष्ट ज्ञान-धनवाला (अथर्वा) = न डाँवाडोल वृत्तिवाला पुरुष (स्वां तन्वम्) = अपने शरीर को (इन्द्रं एव अवोचत्) = परमेश्वर ही कहता है । अन्तः स्थित प्रभु के कारण उसे प्रभु ही समझता है । शीशी में शहद हो, तो शीशी की ओर संकेत करके यही तो कहा जाता है कि 'यह शहद है'। इसी प्रकार आनन्द स्थित प्रभु को देखता हुआ यह अपने शरीर की ओर निर्देश करता हुआ यही कहता है कि 'यह प्रभु ही है'। [२] इस प्रकार ये (स्वसार:) = उस आत्मतत्त्व की ओर चलनेवाले, (मातरिभ्वरी:) = सदा वेदवाणीरूप माता में होनेवाले, अर्थात् वेदज्ञान को प्राप्त होनेवाले (अरिमाः) = निर्दोष पुरुष (हिन्वन्ति च) = उस प्रभु की ओर जाते हैं (च) = और (शवसा) = शक्ति के द्वारा (वर्धयन्ति) = अपने को बढ़ाते हैं । जितना-जितना हम प्रभु के समीप होते जाते हैं, उतनी उतनी हमारी शक्ति बढ़ती जाती है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- ज्ञानी देखता है कि प्रभु की व्याप्ति के कारण वह प्रभु ही तो है । वह प्रभु की ओर चलनेवाला बनता है, सदा ज्ञान में निवास करता है और इस प्रकार अपनी शक्ति को बढ़ाता है । सूक्त का सार यह है कि ज्येष्ठ ब्रह्म का स्तवन करता हुआ यह 'बृहद्दिव' 'इन्द्र' ही हो जाता है । यह अब उस ज्योतिर्मय प्रभु को अपने अन्दर देखने के कारण 'हिरण्यगर्भ' हो जाता है और प्रजाओं के रक्षण में लगा हुआ 'प्राजापत्य' होता है। प्रभु का 'हिरण्यगर्भ' नाम से स्तवन करता हुआ कहता है कि-
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (एव महान् बृहद्दिवः-अथर्वा) एवं महाविद्यावान् स्थिरो योगी (स्वां तन्वम्-इन्द्रम्-एव-अवोचत्) स्वकीयां विस्तृतां स्तुतिं प्रार्थनाम्-इन्द्रं-परमात्मानं प्रत्येव कथयति (स्वसारः-मातरिभ्वरीः-अरिप्राः) स्वयं सरन्त्यस्तथा मातरि जगन्निर्मातरि तस्मिन् परमात्मनि भवन्त्यः-‘मातरि शब्दपूर्वकाद् भूधातोः’ “अन्येभ्योऽपि दृश्यन्ते” [अष्टा० ३।२।७५] इति वनिप् प्रत्ययः “वनो र च” [अष्टा० ४।१।७] इति ङीप्-रेफश्च ‘निष्पापाः’ स्तुतिधाराः-तमिन्द्रं परमात्मानं (हिन्वन्ति च शवसा-वर्धयन्ति च) प्रीणयन्ति “हिन्वन्ति प्रीणयन्ति” [ऋ० १।१४४।५ दयानन्दः] ‘हिवि प्रीणनार्थः’ [भ्वादि०] तथा स्वप्रभावेण वर्धयन्ति स्तोतरि साक्षात् कारयन्ति च ॥९॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Thus does the sage of boundless light and vision of wisdom with settled mind address his song of adoration to Indra only, and the pure immaculate fluent streams of speech like motherly creations inspire the world and exalt humanity with strength and enthusiasm.