मैं 'इन्द्र' ही तो हूँ [यदि वा द्या स्यामहं त्वम्] ए॒वा
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (एवा) = इस प्रकार (महान्) = पूजा की वृत्तिवाला [मह पूजायाम्] (बृहद्दिवः) = उत्कृष्ट ज्ञान-धनवाला (अथर्वा) = न डाँवाडोल वृत्तिवाला पुरुष (स्वां तन्वम्) = अपने शरीर को (इन्द्रं एव अवोचत्) = परमेश्वर ही कहता है । अन्तः स्थित प्रभु के कारण उसे प्रभु ही समझता है । शीशी में शहद हो, तो शीशी की ओर संकेत करके यही तो कहा जाता है कि 'यह शहद है'। इसी प्रकार आनन्द स्थित प्रभु को देखता हुआ यह अपने शरीर की ओर निर्देश करता हुआ यही कहता है कि 'यह प्रभु ही है'। [२] इस प्रकार ये (स्वसार:) = उस आत्मतत्त्व की ओर चलनेवाले, (मातरिभ्वरी:) = सदा वेदवाणीरूप माता में होनेवाले, अर्थात् वेदज्ञान को प्राप्त होनेवाले (अरिमाः) = निर्दोष पुरुष (हिन्वन्ति च) = उस प्रभु की ओर जाते हैं (च) = और (शवसा) = शक्ति के द्वारा (वर्धयन्ति) = अपने को बढ़ाते हैं । जितना-जितना हम प्रभु के समीप होते जाते हैं, उतनी उतनी हमारी शक्ति बढ़ती जाती है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- ज्ञानी देखता है कि प्रभु की व्याप्ति के कारण वह प्रभु ही तो है । वह प्रभु की ओर चलनेवाला बनता है, सदा ज्ञान में निवास करता है और इस प्रकार अपनी शक्ति को बढ़ाता है । सूक्त का सार यह है कि ज्येष्ठ ब्रह्म का स्तवन करता हुआ यह 'बृहद्दिव' 'इन्द्र' ही हो जाता है । यह अब उस ज्योतिर्मय प्रभु को अपने अन्दर देखने के कारण 'हिरण्यगर्भ' हो जाता है और प्रजाओं के रक्षण में लगा हुआ 'प्राजापत्य' होता है। प्रभु का 'हिरण्यगर्भ' नाम से स्तवन करता हुआ कहता है कि-