वांछित मन्त्र चुनें

इ॒मा ब्रह्म॑ बृ॒हद्दि॑वो विव॒क्तीन्द्रा॑य शू॒षम॑ग्रि॒यः स्व॒र्षाः । म॒हो गो॒त्रस्य॑ क्षयति स्व॒राजो॒ दुर॑श्च॒ विश्वा॑ अवृणो॒दप॒ स्वाः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

imā brahma bṛhaddivo vivaktīndrāya śūṣam agriyaḥ svarṣāḥ | maho gotrasya kṣayati svarājo duraś ca viśvā avṛṇod apa svāḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

इ॒मा । ब्रह्म॑ । बृ॒हत्ऽदि॑वः । वि॒व॒क्ति॒ । इन्द्रा॑य । शू॒षम् । अ॒ग्रि॒यः । स्वः॒ऽसाः । म॒हः । गो॒त्रस्य॑ । क्ष॒य॒ति॒ । स्व॒ऽराजः॑ । दुरः॑ । च॒ । विश्वाः॑ । अ॒वृ॒णो॒त् । अप॑ । स्वाः ॥ १०.१२०.८

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:120» मन्त्र:8 | अष्टक:8» अध्याय:7» वर्ग:2» मन्त्र:3 | मण्डल:10» अनुवाक:10» मन्त्र:8


0 बार पढ़ा गया

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (बृहद्दिवः) महाविद्यावान् वेदवेत्ता, विद्वान् (इन्द्राय) ऐश्वर्यवान् परमात्मा के लिये (इमा ब्रह्म) इन स्तोत्रों-स्तुतिवचनों को (विवक्ति) विशेषरूप से कहता है-प्रार्थित करता है (शूषम्) सुख जिससे हो इस प्रयोजन के लिये (अग्रियः) श्रेष्ठ (स्वर्षाः) सुख-सम्भाजक है (महः-स्वराजः) महान् स्वराजमान स्वतःप्रमाण (गोत्रस्य) वाणीसमूह वेद का (क्षयति) स्वामित्व करता है (च) और (स्वाः-विश्वाः) वेद-ज्ञान से स्वकीय सारे (दुरः) द्वारों को (अप-अवृणोत्) उद्घाटित करता है-प्रकाशित करता है ॥८॥
भावार्थभाषाः - वेदविद्या का विद्वान् अपने सुख के लिये परमात्मा की स्तुति प्रार्थना करता है, जो परमात्मा वेदज्ञान का स्वामी है और वेदज्ञान को प्राप्त करके अपने मन आदि द्वारों को खोलता है ॥८॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

इन्द्रिय शक्तियों का विकास-सुख

पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत मन्त्र के अनुसार जिसके जीवन में प्रभु द्वारा अवर व पर धन की स्थापना की गई है वह (बृहद्दिवः) = उत्कृष्ट ज्ञान-धनवाला व्यक्ति (इन्द्राय) = उस परमैश्वर्यशाली प्रभु के लिए (इमा ब्रह्म) = इन स्तोत्रों का (विवक्ति) = उच्चारण करता है। [२] इस स्तवन से (अग्रियः) = जीवन मार्ग में आगे बढ़नेवाला (स्वर्षा:) = प्रकाश को प्राप्त करनेवाला यह 'बृहद्दिव' (शूषम्) = शत्रु-शोषक बल को [नि० ३ । ९] व सुख को [नि० ३ । ६] (क्षयति) = [क्षि गतौ ] प्राप्त होता है और (महः गोत्रस्य) = इस तेजस्वी इन्द्रिय-समूह का (क्षयति) = ईश्वर होता है [क्षि] । [३] यह (स्वराजः) = अपना शासन करनेवाला व्यक्ति (विश्वाः) = सब (स्वा:) = अपने (दुर:) = इन्द्रिय द्वारों को (अप अवृणोत्) = खोलनेवाला होता है, निवृत करनेवाला होता है। इसकी इन्द्रिय शक्तियों का विकास हो जाता है। यह इन्द्रिय शक्तियों का विकास ही वास्तविक 'सुख' है [सु-उत्तम, ख= इन्द्रियाँ] ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु का स्तवन करता हुआ ज्ञानी पुरुष इन्द्रियों का स्वामी बनता है, उनकी शक्तियों का विकास करता है और वास्तविक सुख को पाता है ।
0 बार पढ़ा गया

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (बृहद्दिवः) महाविद्यावान् वेदवेत्ता “बृहद्दिवैः-बृहती दिवा विद्या येषां तेः” [ऋ० १।१६७।२ दयानन्दः] (इन्द्राय) ऐश्वर्यवते परमात्मने (इमा ब्रह्म विवक्ति) इमानि ब्रह्माणि स्तोत्राणि स्तुतिवचनानि विशेषेण ब्रवीति-प्रार्थयते (शूषम्) सुखं यथा स्यादिति स्वप्रयोजनार्थम् अतः (अग्रियः स्वर्षाः) श्रेष्ठः सुखसम्भाजकोऽस्ति ‘स्वः पूर्वकात् षण धातोः “जनसनखनक्रमगमो विट्” [अष्टा० ३।२।६७] पुनः “विड्वनोरनुनासिकस्यात्” [अष्टा० ६।४।४१] (महः स्वराजः-गोत्रस्य क्षयति) महतः स्वराजमानस्य स्वतःप्रमाणस्य वाक्समूहस्य वेदस्य खल्वीष्टेऽधिपतिर्भवति “क्षयति-ऐश्वर्यकर्मा” [निघ० २।२१] (स्वाः-विश्वाः-दुरः-च-अप-अवृणोत्) वेदज्ञानद्वारेण स्वकीयानि सर्वाणि स्वरूपद्वाराणि खलूद्घाटयति प्रकाशयति ॥८॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - The poet of boundless heavenly light speaks these divine verses in honour of Indra for his own spiritual peace and pleasure. First and foremost among eminent poets, self-illuminant, self-refulgent and self- controlled, he masters the mighty treasure of Vedic wisdom and he opens the flood gates of his own vision of universal light and wisdom.