पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे प्रभो ! (यस्मिन् दुरोणे) = जिस यज्ञशील पुरुष के इस शरीर रूप गृह में (अवसा) = [protection, food, wealth] रक्षण के द्वारा, उत्तम भोजन के द्वारा व धनों के द्वारा (आविथ) = आप रक्षण करते हो, उस गृह में (तत्) = उस प्रसिद्ध (अवरम्) = इस निचले पार्थिव धन को (परं च) = और उत्कृष्ट दिव्य धन को (नि दधिषे) = निश्चय से स्थापित करते हो। आप संसार यात्रा के लिए पार्थिव धनों को प्राप्त कराते हो, तो अध्यात्म उत्कर्ष के लिए दिव्य धन को देते हो। अथवा आप शक्ति व ज्ञान की स्थापना करते हो-क्षत्र और ब्रह्म की। [२] आप (जिगत्नू) = गतिशील मातरा जीवन का निर्माण करनेवाली पार्थिव व दिव्यशक्तियों की आस्थापयसे स्थापना करते हैं। हमारा शरीर व मस्तिष्क [पृथिवीलोक व द्युलोक] दोनों ही बड़े गतिशील होते हैं। और अतः इससे क्षत्र व ब्रह्म के प्रायण से आप (पुरुणि कर्वरा) = पालक व पूरक कर्मों को [ कर्वर = work ] (इनोषि) = व्याप्त करते हैं। हम प्रभु से शक्ति व ज्ञान को प्राप्त करके उन कर्मों को करनेवाले बनते हैं जो हमारा पालन व पूरण करते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु हमारे में अवर और पर धन की स्थापना करते हैं। हमें शक्ति व ज्ञान देते हैं, जिनसे कि हम पालक व पूरक कर्म कर पाते हैं।