ऋषि आश्रय, नकि दानव - गृह
पदार्थान्वयभाषाः - [१] मैं उस इन्द्र का स्तवन करता हूँ जो (स्तुषेय्यम्) = [स्तोतव्यम्] स्तुति के योग्य हैं, (ऋभ्वम्) = [उरु भासमाने] खूब दीप्त हैं, (पुरुवर्पसप्) = नानारूपोंवाले हैं 'रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव' । (इनतमम्) = जो सर्वमहान् इश्वर हैं, (आप्त्यानां आप्त्यम्) = आप्त्यों में आप्त्य हैं, विश्वसनीयों में विश्वसनीय हैं। [२] स्तुति किये गये ये प्रभु (शवसा) = शक्ति के द्वारा (सप्त दानून्) = सप्त ऋषियों के विपरीत सप्त दानवृत्तियों को (आदर्षते) = विदीर्ण करते हैं । और (प्रतिमानानि) = इनके प्रत्येक निवास स्थान को (भूरि प्रसाक्षते) = खूब ही विनष्ट करते हैं । [प्रतिमानानि = असुराणां स्थानानि] । [३] 'सप्त ऋषयः प्रतिहिताः शरीर' शरीर में सात ऋषियों की स्थापना हुई है। ये सात उत्तम भावनाएँ विकृत होती हैं, तो ये सात दानव बन जाते हैं। प्रभु इन दानवों के किलों का विनाश करते हैं हमारा जीवन प्रभु कृपा से विषयास्वाद् [लक् आस्वादने] से ऊपर उठकर फिर से अजेय हो जाता है, हमें वासनाएँ पराजित नहीं कर पाती ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु स्मरण से हमारा जीवन दानव-गृह नहीं, अपितु ऋषियों का आश्रय बनता है ।