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ओ॒षमित्पृ॑थि॒वीम॒हं ज॒ङ्घना॑नी॒ह वे॒ह वा॑ । कु॒वित्सोम॒स्यापा॒मिति॑ ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
oṣam it pṛthivīm ahaṁ jaṅghanānīha veha vā | kuvit somasyāpām iti ||
पद पाठ
ओ॒षम् । इत् । पृ॒थि॒वीम् । अ॒हम् । ज॒ङ्घना॑नि । इ॒ह । वा॒ । इ॒ह । वा॒ । कु॒वित् । सोम॑स्य । अपा॑म् । इति॑ ॥ १०.११९.१०
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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:119» मन्त्र:10
| अष्टक:8» अध्याय:6» वर्ग:27» मन्त्र:4
| मण्डल:10» अनुवाक:10» मन्त्र:10
ब्रह्ममुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (अहम्) मैं (ओषम्-इत्) दाहक सूर्य को अवश्य (पृथिवीम्) अन्तरिक्ष के प्रति (इह वा-इह वा) यहाँ या वहाँ (जङ्घनानि) बहुत प्रेरित करता हूँ (कुवित्०) पूर्ववत् ॥१०॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा के आनन्दरस का बहुत पान करनेवाला प्रखर तापवाले सूर्य को इस अन्तरिक्ष में यहाँ इच्छानुसार उपयोग में लाता है या ध्यान द्वारा भी उपयोग में लाता है ॥१०॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
पृथ्वी पर सूर्य
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (कुवित्) = खूब ही (सोमस्य) = सोम का (अपाम्) = मैंने पान किया है, (इति) = इस कारण (इत्) = निश्चय से (ओषम्) = अपने तेज से तपानेवाले आदित्य को (अहम्) = मैं (इह वा इह वा) = इस स्थान में व उस स्थान में, यथेष्ट स्थान में (पृथिवीं जङ्घनानि) = पृथिवी पर प्राप्त करा दूँ। [२] सोमरक्षण- वाला, वीर्यरक्षणवाला पुरुष जहाँ चाहे वहाँ पृथिवी पर सूर्य को प्राप्त करा सकता है। योगसिद्धियों में भी इस प्रकार की अद्भुत शक्तियाँ प्राप्त हो जाती हैं। वीर्यरक्षण से पुरुष सम्पूर्ण पृथिवी को सूर्य की तरह प्रकाशमय करनेवाला होता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोम का रक्षण होने पर इस पृथ्वीरूप शरीर में ज्ञान के सूर्य का उदय होता है ।
ब्रह्ममुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (अहम्-ओषम्-इत्) अहं दाहकं सूर्यं हि (पृथिवीम्) अन्तरिक्षं प्रति “पृथिवी-अन्तरिक्षनाम” [निघ० १।३] (इह वा-इह वा जङ्घनानि) अत्र वाऽमुत्र वा भृशं प्रेरयामि-प्रक्षिपामि “हन हिंसागत्योः” [अदादि०] गत्यर्थोऽत्र लक्ष्यते ततो यङ्लुगन्तप्रयोगः (कुवित्०) पूर्ववत् ॥१०॥
डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - And I can heat up this earthly body to light and take it here, there, anywhere, for I have drunk of the soma of the spirit divine.
