दान धन के अनुपात में नहीं
पदार्थान्वयभाषाः - [१] दान धन की न्यूनाधिकता पर निर्भर नहीं है, यह तो मन की उदारता व संकुचितता के साथ सम्बद्ध है । उदार मनवाला एकपाद्- 'एक भाग' धनवाला पुरुष (द्विपदः) = संकुचित मनवाले 'द्विभाग धन' वाले पुरुष से (भूयः विचक्रमे) = अधिक पराक्रम करनेवाला होता है । एक भाग धनवाला द्विभाग धनवाले से अधिक दान दे देता है । [२] (द्विपात्) = द्विभाग धनवाला पुरुष (त्रिपादम्) = त्रिभाग धनवाले (पश्चात्) = पुरुष के पीछे-पीछे (अभ्येति) = आनेवाला होता है । अर्थात् जैसे कई बार पच्चीस रुपयेवाला पचास रुपयेवाले से अधिक दान दे देता है, इसी प्रकार पचास रुपयेवाला, उदारता के होने पर, पचहत्तर रुपयेवाले के बराबर दान देनेवाला बनता है। [३] (चतुष्पाद्) = चार भाग धनवाला, अर्थात् सौ रुपयेवाला (द्विपदाम्) = दो भाग धनवालों के पचास रुपये वालों के (अभिस्वरे) = नामोच्चारण में (एति) = आता है, अर्थात् जितना द्विपदों का दान सुनाया जाता है उतना ही इस चतुष्पात् का दान होता है। यह चतुष्पात् उन द्विपदों को (संपश्यन्) = देखता हुआ पंक्ती (उपतिष्ठमानः) = उनकी पंक्तियों का उपस्थान करता है, उनके समीप उपस्थित हुआ हुआ दिल में उनका आदर ही करता है कि 'मेरे से आधी सम्पत्तिवाले होते हुए भी ये मेरे बराबर देनेवाले हुए हैं'। इस प्रकार दान की न्यूनाधिकता धन पर आश्रित न होकर हृदय की विशालता पर आश्रित है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम विशाल हृदय होंगे तो अधिक दान देनेवाले होंगे। अधिक दान देने से हृदय को विशाल व पवित्र बना पाएँगे ।