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मोघ॒मन्नं॑ विन्दते॒ अप्र॑चेताः स॒त्यं ब्र॑वीमि व॒ध इत्स तस्य॑ । नार्य॒मणं॒ पुष्य॑ति॒ नो सखा॑यं॒ केव॑लाघो भवति केवला॒दी ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

mogham annaṁ vindate apracetāḥ satyam bravīmi vadha it sa tasya | nāryamaṇam puṣyati no sakhāyaṁ kevalāgho bhavati kevalādī ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

मोघ॑म् । अन्न॑म् । वि॒न्द॒ते॒ । अप्र॑ऽचेताः । स॒त्यम् । ब्र॒वी॒मि॒ । व॒धः । इत् । सः । तस्य॑ । न । अ॒र्य॒मण॑म् । पुष्य॑ति । नो इति॑ । सखा॑यम् । केव॑लऽअघः । भ॒व॒ति॒ । के॒व॒ल॒ऽआ॒दी ॥ १०.११७.६

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:117» मन्त्र:6 | अष्टक:8» अध्याय:6» वर्ग:23» मन्त्र:1 | मण्डल:10» अनुवाक:10» मन्त्र:6


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अप्रचेताः) अप्रकृष्ट बुद्धिवाला-बेसमझ मनुष्य (मोघम्) व्यर्थ (अन्नं विन्दते) अन्नादि धन को प्राप्त करते हैं (सत्यं ब्रवीमि) मैं सत्य कहता हूँ (तस्य) उसका (सः) वह धन वैभव (वधः-इत्) वधक है-घातक ही है (अर्यमणम्) उस अन्नादि से ज्ञानदाता विद्वान् को (न पुष्यति) नहीं पालता है (न-उ सखायम्) और न ही समानधर्मी समानवंशी सम्बन्धी को पालता है-घोषित करता है, वह ऐसा (केवलादी) अकेला खानेवाला (केवलाघः) केवल पापी होता है ॥६॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य अन्न धन सम्पत्ति का स्वामी बनकर उससे किसी ज्ञान देनेवाले विद्वान् का पोषण नहीं करता न किसी वंशीय सम्बन्धी का पोषण करता है, उसका अन्नधन सम्पत्ति पाना व्यर्थ है-घातक है, वह केवल अकेले खाकर पापी बनकर संसार से चला जाता है ॥६॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

केवलाघः = केवलादी

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अप्रचेता:) = गत मन्त्र में वर्णित तत्त्व को न समझनेवाला, धनों की अस्थिरता का विचार न करनेवाला (अन्नं मोघं विन्दते) = अन्न को व्यर्थ ही प्राप्त करता है। प्रभु कहते हैं कि (सत्यं ब्रवीमि) = मैं यह सत्य ही कहता हूँ कि (स) = वह अन्न व धन (तस्य) = उसका (इत्) = निश्चय से (वधः) = वध का कारण होता है। यह अदत्त अन्न व धन उसकी विलास वृद्धि का हेतु होकर उसका विनाश कर देता है। [२] यह (अप्रचेताः) = नासमझ व्यक्ति (न) = न तो (अर्यमणम्) = [अरीन् यच्छति] राष्ट्र के शत्रुओं का नियमन करनेवाले राजा को (पुष्यति) = पुष्ट करता है, नो और ना ही (सखायम्) = मित्र को । यह कृपण व्यक्ति राष्ट्र रक्षा के लिए राजा को भी धन नहीं देता और ना ही इस धन से मित्रों की मदद करता है । [३] यह दान न देकर (केवलादी) = अकेला खानेवाला व्यक्ति (केवलाघः भवति) = शुद्ध पाप ही पाप हो जाता है। यज्ञों को न करनेवाला यह (मलिम्लुच) = चोर ही कहलाता है। अदानशील पुरुष भौतिक वृत्तिवाला बनकर भोगों का शिकार हो जाता है। लोभ के बढ़ जाने से पापवृत्तिवाला हो जाता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- दान न देनेवाला धनी पुरुष भोगसक्त होकर अपना ही विनाश कर बैठता है और उसकी पापवृत्ति बढ़ती जाती है। ऋषिः
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अप्रचेताः-मोघम्-अन्नम्-विन्दते) अप्रकृष्टचेतस्को जनो व्यर्थमन्नं प्राप्नोति (सत्यं ब्रवीमि वधः-इत् सः-तस्य) सत्यं कथयामि वधक एव च तस्य (अर्यमणं न पुष्यति न-उ सखायम्) तेनान्नेन ज्ञानदातारं विद्वांसं न पोषयति न च समानधर्माणं समानवंशं वा पोषयति (केवलादी केवलाघः-भवति) एकाकी भुञ्जानः केवलपापवान् भवति ॥६॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - The man of no knowledge and short vision gets food in vain and prosperity for nothing. Verity I say that prosperity is his min, his very death in life. He prospers not who helps neither the friend nor the wise, eating all by himself he eats nothing but sin.