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पृ॒णी॒यादिन्नाध॑मानाय॒ तव्या॒न्द्राघी॑यांस॒मनु॑ पश्येत॒ पन्था॑म् । ओ हि वर्त॑न्ते॒ रथ्ये॑व च॒क्रान्यम॑न्य॒मुप॑ तिष्ठन्त॒ राय॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

pṛṇīyād in nādhamānāya tavyān drāghīyāṁsam anu paśyeta panthām | o hi vartante rathyeva cakrānyam-anyam upa tiṣṭhanta rāyaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

पृ॒णी॒यात् । इत् । नाध॑मानाय । तव्या॑न् । द्राघी॑यांसम् । अनु॑ । प॒श्ये॒त॒ । पन्था॑म् । ओ इति॑ । हि । व॒र्त॒न्ते॒ । रथ्या॑ऽइव । च॒क्रा । अ॒न्यम्ऽअ॑न्यम् । उप॑ । ति॒ष्ठ॒न्त॒ । रायः॑ ॥ १०.११७.५

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:117» मन्त्र:5 | अष्टक:8» अध्याय:6» वर्ग:22» मन्त्र:5 | मण्डल:10» अनुवाक:10» मन्त्र:5


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (तव्यान्) धनसमृद्ध जन (नाधमानाय) अधिकार माँगनेवाले के लिये उसे (पृणीयात्) भोजनादि से तृप्त करे (द्राघीयांसम्) अतिदीर्घ लम्बे उदार (पन्थाम्) मार्ग को (अनु पश्येत) देखे-समझे (रायः) सम्पत्तियाँ (रथ्या चक्रा-इव) रथ के चक्रों पहियों की भाँति (आ वर्तन्ते-उ हि) आवर्तन किया करती हैं, भिन्न-भिन्न स्थानों में घूमा करती हैं (अन्यम्-अन्यम्-उप तिष्ठन्त) भिन्न-भिन्न स्थान को आश्रित करती हैं ॥५॥
भावार्थभाषाः - धनसम्पन्न मनुष्य अपने अन्न धन सम्पत्ति से अधिकार माँगनेवाले को तृप्त करे, इस प्रकार उदारता के मार्ग को अनुभव करे, क्योंकि धन सम्पत्तियाँ सदा एक के पास नहीं रहती हैं, वे तो गाड़ी के पहियों की भाँति घूमा करती हैं, आती-जाती रहती हैं ॥५॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

रथचक्र की तरह चलायमान 'धन'

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (तन्यान्) = धनों के दृष्टिकोण से बढ़ा हुआ पुरुष (नाधमानाय) = माँगनेवाले के लिए (पृणीयात् इत्) = दे ही जिस समय कोई माँगनेवाला आये, तो इनकार करने की अपेक्षा (द्राघीयांसं पन्थाम्) = इस लम्बे मार्ग को (अनुपश्येत) = देखे । इस अतिविस्तृत समय में पता नहीं किसी का कब कैसा समय आ जाए ? [२] ये (रायः) = धन तो (रथ्या चक्रा इव) = रथ के पहियों की तरह हि (उ) = निश्चय से (आवर्तन्ते) = आवृत हो रहे हैं । (अन्यं अन्यं) = दूसरे दूसरे के पास (उपतिष्ठन्ते) = ये धन उपस्थित होते हैं। जैसे रथ के पहिये का एक भाग जो ऊपर है, वह थोड़ी देर के बाद नीचे हो जाता है उसी प्रकार आज एक व्यक्ति धन के दृष्टिकोण से खुद उन्नत है, जितना चाहे दे सकता है । कल वही निर्धन अवस्था में होकर माँगनेवालों में भी शामिल हो सकता है। इसलिए सामर्थ्य के होने पर देना ही चाहिए।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- धन अस्थिर हैं। कल हमारे पास भी सम्भवतः न रहें। सो शक्ति के होने पर माँगनेवाले के लिए देना ही चाहिए ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (तव्यान्) तवीयान् प्रवृद्धः समृद्धो जनः “तु वृद्धौ” [अदादि०] (नाधमानाय पृणीयात्) याचमानाय “नाथृ नाधृ याच्ञोपतापैश्वर्याशीःषु” [भ्वादि०] भोजनानि दद्यात् (द्राघीयांसं पन्थाम्-अनु पश्येत) दीर्घतममुदारताया मार्गमनुपश्येत्-अनुभवेत् (रायः) सम्पत्तयः (आ वर्त्तन्ते-उ हि रथ्या चक्रा-इव) रथचक्राणीव-आवर्तन्ते नैकत्र तिष्ठन्ति किन्तु भिन्नभिन्न-स्थानेषु चलन्ति हि (अन्यम्-अन्यम्-उप तिष्ठन्त) भिन्नं भिन्नमाश्रयन्ति ॥५॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - The rich man should give for the poor seeker, he should see the paths of life in the long run. Riches move like wheels of the chariot: Now they are at one place, now they move to another.