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य आ॒ध्राय॑ चकमा॒नाय॑ पि॒त्वोऽन्न॑वा॒न्त्सन्र॑फि॒तायो॑पज॒ग्मुषे॑ । स्थि॒रं मन॑: कृणु॒ते सेव॑ते पु॒रोतो चि॒त्स म॑र्डि॒तारं॒ न वि॑न्दते ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ya ādhrāya cakamānāya pitvo nnavān san raphitāyopajagmuṣe | sthiram manaḥ kṛṇute sevate puroto cit sa marḍitāraṁ na vindate ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यः । आ॒ध्राय॑ । च॒क॒मा॒नाय॑ । पि॒त्वः । अन्न॑ऽवान् । सन् । र॒फि॒ताय॑ । उ॒प॒ऽज॒ग्मुषे॑ । स्थि॒रम् । मनः॑ । कृ॒णु॒ते । सेव॑ते । पु॒रा । उ॒तो इति॑ । चि॒त् । सः । म॒र्डि॒तार॑म् । न । वि॒न्द॒ते॒ ॥ १०.११७.२

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:117» मन्त्र:2 | अष्टक:8» अध्याय:6» वर्ग:22» मन्त्र:2 | मण्डल:10» अनुवाक:10» मन्त्र:2


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (यः) जो अन्नवाला होता हुआ (आध्राय) दरिद्र के लिये (पित्वः-चकमानाय) अन्न को चाहनेवाले भूखे के लिये (रफिताय) पीड़ित के लिये (उप जग्मुषे) शरणागत के लिये (मनः स्थिरं कृणुते) मन को स्थिर करता है, ढीठ बनाता है, देने को नहीं सोचता है (पुरा सेवते) उससे पहले उसके देखते हुए स्वयं खाता है (उत-उ-सः) ऐसा वह (मर्डितारं न विन्दते) सुख देनेवाले परमात्मा को नहीं प्राप्त करता है ॥२॥
भावार्थभाषाः - अन्नवाला होकर के मनुष्य दरिद्र के लिये, भूखे के लिये, पीड़ित के लिये, शरणागत के लिये अवश्य भोजन दे, जो इनको न देकर स्वयं खाता है, वह पापी है, वह सुख देनेवाले परमात्मा को प्राप्त नहीं करता है ॥२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

क्रूरता की पराकाष्ठा

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यः) = जो (अन्नवान् सन्) = खूब अन्नवाला होता हुआ भी (आध्राय) = आधार देने योग्य, अर्थात् अपाहिज के लिए, (पित्वः चकमानाय) = अन्न की याचना करनेवाले के लिए, (रफिताय) = भूखे मर रहे [हिंसित] के लिए, (उपजग्मुषे) = अन्न मिलने की आशा से समीप आये हुए के लिए (मनः स्थिरं कृणुते) = मन को बड़ा पक्का करता है, उसमें नैसर्गिक करुणा को भी मारने का प्रयत्न करके न देने का निश्चय करता है । (उत उ) = और मन को केवल दृढ़ करके ही रुक जाए ऐसा न करके (पुरा चित् सेवते) = उसके सामने ही अन्नों का [ मजे से] सेवन करता है (सः) = वह (मर्डितारम्) = उस सुख देनेवाले प्रभु को (न विन्दते) = कभी प्राप्त नहीं करता । [२] आधार देने योग्य अपाहिज को, अन्न की याचना करनेवाले को, भूख से मरे जाते हुए को तथा अन्न की आशा से समीप आये हुए को अन्न देना ही चाहिए। 'इनकार कर देना' उन याचकों के दिल को तोड़ देता है उनके सामने खाने का मजा लेने लगना तो क्रूरता की पराकाष्ठा ही है। मनुष्यता के साथ इतनी दिल की क्रूरता का विरोध है। इस क्रूर - हृदय ने प्रभु को क्या पाना ? उस भूखे के रूप में प्रभु ने ही उसे सेवा का मौका दिया, पर इस नासमझ ने उस अवसर से लाभ न लिया ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - भूखे को रोटी न देकर, उसके सामने स्वाद से खाते जाना मानवता नहीं है ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (यः-अन्नवान् सन्) यो जनोऽन्नवान् सन् (आध्राय) दरिद्राय “आध्रः-आढ्यालुर्दरिद्रः” [निरु० १२।२४] (पित्वः-चकमानाय) अन्नं कामयमानाय बुभुक्षिताय (रफिताय) पीडिताय (उपजग्मुषे) शरणागताय (मनः स्थिरं कृणुते) मनो धृष्टं करोति दातुं न भावयति (पुरा सेवते) तस्य-पश्यतः पूर्वं सेवते स्वयं भुङ्क्ते (उत-उ-सः-मर्डितारं न विन्दते) अपि च स सुखयितारं परमात्मानं न प्राप्नोति ॥२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - The man of means in plenty who does not give in charity to the poor, needy, hunger afflicted supplicant that comes to his door but hardens his heart and, further, himself enjoys the fruits of his riches in his very presence, finds no grace, no comfort, none to console him.