इन्द्र व अग्नितत्त्व का विकास
पदार्थान्वयभाषाः - [१] मैं (इन्द्राग्निभ्याम्) = इन्द्र और अग्निदेव के लिए, बल व प्रकाश की प्राप्ति के लिए [सर्वाणि बल कर्माणि इन्द्रस्य, अग्नि-प्रकाश] (अर्कैः) = वेद-मन्त्रों के द्वारा (सुवचस्याम्) = उत्तम उच्चारण करने योग्य स्तुति को इस प्रकार प्र इयर्मि प्रेरित करता हूँ (इव) = जैसे कि (सिन्धौ) = समुद्र में (नावम्) = नौका को । मेरी प्रभु से यही आराधना होती है कि मुझे शक्ति प्राप्त हो और मैं प्रकाश को प्राप्त करनेवाला होऊँ । मेरा मस्तिष्क प्रकाशमय हो और शरीर शक्ति-सम्पन्न । नौका समुद्र से पार लगाती है, यह स्तुति निर्बलता व अन्धकार को दूर करती है। [२] ऐसा होने पर (देवाः) = सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र आदि सब देव (अयाः) = कर्मकरों की इव तरह (परिचरन्ति) = हमारी सेवा करते हैं, (ये) = जो देव (अस्मभ्यम्) = हमारे लिए (धनदा:) = धनों के देनेवाले हैं (उद्भिदः च) = और हमारे शत्रुओं का उद्भेदन करनेवाले हैं। शत्रुओं के विदारण के द्वारा ये देव हमारी उन्नति का कारण होते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम प्रभु का स्तवन करें। प्रभु हमें प्रकाश व बल प्राप्त कराएँ सूर्यादि सब देव हमें आवश्यक धन प्राप्त कराएँ और हमारी उन्नति का कारण बनें । सूक्त का विषय सोमपान के द्वारा जीवन को प्रशस्त करने का है। इस सोमपान के द्वारा ही हमारे जीवन में अग्नि व इन्द्र तत्त्व का विकास होता है, हम प्रकाश व शक्ति को प्राप्त करते हैं । इन दोनों तत्त्वों का विकास हमें अत्यन्त उत्कृष्ट जीवनवाला बनाता है। जीवन के उत्कर्ष के लिए यह भी आवश्यक है कि हम देनेवाले बनें। धन के मोह से ऊपर उठनेवाला, सर्वस्व त्यागी 'भिक्षु' अगले सूक्त का ऋषि है-