पदार्थान्वयभाषाः - [१] प्रभु जीव से कहते हैं कि हे (इन्द्र) = जितेन्द्रिय पुरुष ! (इमा प्रस्थिता) = इन प्रकृष्ट स्थितिवाली (हवींषि) = हवियों को (इत्) = ही (अद्धि) = खा । हवि, अर्थात् दानपूर्वक अदन मनुष्य को प्रकृष्ट स्थिति प्राप्त कराता है इस हवि के द्वारा ही तो वस्तुतः प्रभु का पूजन होता है। इस प्रकार यह हवि हमारी सर्वोच्च स्थिति का कारण बनती है। [२] प्रभु कहते हैं कि हे जीव ! तू (चनः दधिष्व) = अन्न को ही धारण कर । अन्न का ही सेवन करनेवाला बन । (उत) = और (सोमम्) = सोम को (पचत) = अपने में परिपक्व करो। [३] प्रभु के आदेश को सुनकर जीव कहता है कि (प्रयस्वन्तः) = उत्तम अन्नोंवाले होते हुए हम (त्वा प्रतिहर्यामसि) = आपके प्रति आते हैं । (यजमानस्य) = यज्ञशील पुरुष की (कामा:) = कामनाएँ (सत्याः सन्तु) = सदा सत्य हों। यह कभी असत्य कामनाओं को करनेवाला न हो। मैं यज्ञशील होता हुआ अनृत कामनाओं से ऊपर उठूं। मेरी कामना यही हो 'असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मा अमृतं गमय' ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु के तीन आदेश हैं - [क] दानपूर्वक अदनवाले बनो, [ख] अन्नों का सेवन करो, [ग] शरीर में सोम को परिपक्व करो। इन आदेशों को सुनकर जीव प्रार्थना करता है कि अन्नों का सेवन करते हुए हम आपकी ओर आएँ तथा सदा सत्य कामनाओंवाले हों ।