दानपूर्वक अदन - सोम का रक्षण
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (मघवन्) = परमैश्वर्यशालिन् प्रभो ! (इदं हविः) = यह हवि (तुभ्यं रातम्) = आपकी प्राप्ति के लिए दी गई है, हवि के द्वारा ही प्रभु का पूजन होता है। हे प्रभो ! (सम्राट्) = आप ही शासक हो । (अहृणान:) = किसी भी प्रकार हमारे पर क्रुद्ध न होते हुए (प्रति गृभाय) = इस हवि को ग्रहण करिये । वस्तुतः हवि के द्वारा प्रभु-पूजन करनेवाला प्रभु का प्रिय होता है, प्रभु इसपर कभी अप्रसन्न नहीं होते । 'दानपूर्वक अदन'-' यज्ञशेष का सेवन'-'हवि' ही मार्ग है, प्रभु के आराधन का। [२] हे (मघवन्) = ऐश्वर्यशालिन् प्रभो! (तुभ्यं सुतः) = आपकी प्राप्ति के लिए ही शरीर में इस सोम का उत्पादन हुआ है। (तुभ्यं पक्वः) = आपकी प्राप्ति के लिए ही संयमाग्नि में इसका ठीक प्रकार से परिपाक किया गया है। [३] प्रभु जीव से कहते हैं कि इन्द्र है जितेन्द्रिय पुरुष ! तू (प्रस्थितस्य) = प्रकर्षेण स्थित इस सोम का (अद्धि) = भक्षण करनेवाला हो, शरीर की शक्तियों के विकास में ही तू इसे [to consuere] व्ययित करनेवाला हो । (च) = और (पिब) = तू शरीर में ही इसका पान कर, इसे शरीर में ही व्याप्त करने के लिए यत्नशील हो ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु प्राप्ति के लिए दो साधन हैं - [ख] दानपूर्वक अदन, [ख] सोम का रक्षण ।