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इ॒दं ह॒विर्म॑घव॒न्तुभ्यं॑ रा॒तं प्रति॑ सम्रा॒ळहृ॑णानो गृभाय । तुभ्यं॑ सु॒तो म॑घव॒न्तुभ्यं॑ प॒क्वो॒३॒॑ऽद्धी॑न्द्र॒ पिब॑ च॒ प्रस्थि॑तस्य ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

idaṁ havir maghavan tubhyaṁ rātam prati samrāḻ ahṛṇāno gṛbhāya | tubhyaṁ suto maghavan tubhyam pakvo ddhīndra piba ca prasthitasya ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

इ॒दम् । ह॒विः । म॒घ॒ऽव॒न् । तुभ्य॑म् । रा॒तम् । प्रति॑ । सम्ऽरा॑ट् । अहृ॑णानः । गृ॒भा॒य॒ । तुभ्य॑म् । सु॒तः । म॒घ॒ऽव॒न् । तुभ्य॑म् । प॒क्वः॑ । अ॒द्धि । इ॒न्द्र॒ । पिब॑ । च॒ । प्रऽस्थि॑तस्य ॥ १०.११६.७

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:116» मन्त्र:7 | अष्टक:8» अध्याय:6» वर्ग:21» मन्त्र:2 | मण्डल:10» अनुवाक:10» मन्त्र:7


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (मघवन्) हे राजसूय यज्ञ को प्राप्त या संस्कारयज्ञ से संस्कृत (इन्द्र) हे राजन् ! या आत्मन् ! (तुभ्यम्) तेरे लिये (इदं हविः) यह उपहाररूप या खाने योग्य (रातम्) दिये हुए को (सम्राट्) सम्यक् राजमान हुआ (अहृणानः) निस्सङ्कोच हुआ-निर्लज्ज हुआ (प्रति गृभाय) स्वीकार कर या ले (तुभ्यम्) तेरे लिये (सुतः) निष्पादित सोमरस उसे (पिब) पी (च) और (तुभ्यम्) तेरे लिये (पक्वः) पका हुआ भोजन पदार्थ (प्रस्थितस्य) समर्पित है (अद्धि) उसे खा ॥७॥
भावार्थभाषाः - राजा जब राजसूययज्ञ में राजपद को प्राप्त होता है-राजा बनता है तब उसके लिये उपहार भेंट दी जानी चाहिये, उसके लिये पीने को सोमरस और खाने को पौष्टिक पकवान भेंट करने चाहिये एवं जब आत्मा वेदारम्भ संस्कार से संस्कृत हो जावे, तब उसे प्राशन के लिये रस, दूध, दही आदि और पके हुए मिष्ठान्न आदि देना चाहिये ॥७॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

दानपूर्वक अदन - सोम का रक्षण

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (मघवन्) = परमैश्वर्यशालिन् प्रभो ! (इदं हविः) = यह हवि (तुभ्यं रातम्) = आपकी प्राप्ति के लिए दी गई है, हवि के द्वारा ही प्रभु का पूजन होता है। हे प्रभो ! (सम्राट्) = आप ही शासक हो । (अहृणान:) = किसी भी प्रकार हमारे पर क्रुद्ध न होते हुए (प्रति गृभाय) = इस हवि को ग्रहण करिये । वस्तुतः हवि के द्वारा प्रभु-पूजन करनेवाला प्रभु का प्रिय होता है, प्रभु इसपर कभी अप्रसन्न नहीं होते । 'दानपूर्वक अदन'-' यज्ञशेष का सेवन'-'हवि' ही मार्ग है, प्रभु के आराधन का। [२] हे (मघवन्) = ऐश्वर्यशालिन् प्रभो! (तुभ्यं सुतः) = आपकी प्राप्ति के लिए ही शरीर में इस सोम का उत्पादन हुआ है। (तुभ्यं पक्वः) = आपकी प्राप्ति के लिए ही संयमाग्नि में इसका ठीक प्रकार से परिपाक किया गया है। [३] प्रभु जीव से कहते हैं कि इन्द्र है जितेन्द्रिय पुरुष ! तू (प्रस्थितस्य) = प्रकर्षेण स्थित इस सोम का (अद्धि) = भक्षण करनेवाला हो, शरीर की शक्तियों के विकास में ही तू इसे [to consuere] व्ययित करनेवाला हो । (च) = और (पिब) = तू शरीर में ही इसका पान कर, इसे शरीर में ही व्याप्त करने के लिए यत्नशील हो ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु प्राप्ति के लिए दो साधन हैं - [ख] दानपूर्वक अदन, [ख] सोम का रक्षण ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (मघवन्-इन्द्र) हे राजसूययज्ञं गत ! ऐश्वर्यवन् राजन् ! यद्वा संस्कारयज्ञेन संस्कृत आत्मन् ! (तुभ्यम्-इदं हविः-रातम्) तुभ्यमेदुपहाररूपं प्राशनीयं दत्तं (सम्राट्-अहृणानः-प्रतिगृभाय) सम्यग् राजमानः-अलज्जमानः “हृणीङ् रोषे लज्जायां च” [कण्वादि०] प्रतिगृहाण स्वीकुरु “ग्रहधातोः-छन्दसि शायजपि” [अष्टा० ३।१।८४] इति शायच् प्रत्ययः ‘लोटि मध्यमैकवचने हकारस्य भकारश्छान्दसः’ (तुभ्यं सुतः) हे राजन्-आत्मन् ! वा तुभ्यं निष्पादितः सोमरसस्तं (पिब च) पिब च (तुभ्यं पक्वः प्रस्थितस्य अद्धि) तुभ्यं पक्वोऽग्निपक्वः पदार्थः समर्पितः ‘व्यत्ययेन षष्ठी’ तं भुङ्क्ष्व ॥७॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, lord of glory, this homage and tribute is offered to you. O ruler of self, humanity and all life, pray take it freely without inhibition or hesitation. For you is the soma distilled and offered, O lord of majesty. For you is the food prepared and seasoned. Pray accept it, taste of it and drink of it as it is prepared with faith and love without reservation.