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नि ति॒ग्मानि॑ भ्रा॒शय॒न्भ्राश्या॒न्यव॑ स्थि॒रा त॑नुहि यातु॒जूना॑म् । उ॒ग्राय॑ ते॒ सहो॒ बलं॑ ददामि प्र॒तीत्या॒ शत्रू॑न्विग॒देषु॑ वृश्च ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ni tigmāni bhrāśayan bhrāśyāny ava sthirā tanuhi yātujūnām | ugrāya te saho balaṁ dadāmi pratītyā śatrūn vigadeṣu vṛśca ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

नि । ति॒ग्मानि॑ । भ्रा॒शय॑न् । भ्राश्या॑नि । अव॑ । स्थि॒रा । त॒नु॒हि॒ । या॒तु॒ऽजूना॑म् । उ॒ग्राय॑ । ते॒ । सहः॑ । बल॑म् । द॒दा॒मि॒ । प्र॒ति॒ऽइत्य॑ । शत्रू॑न् । वि॒ऽग॒देषु॑ । वृ॒श्च॒ ॥ १०.११६.५

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:116» मन्त्र:5 | अष्टक:8» अध्याय:6» वर्ग:20» मन्त्र:5 | मण्डल:10» अनुवाक:10» मन्त्र:5


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (भ्राश्यानि) ज्वलनीय (स्थिरा) स्थिर दृढ़ (तिग्मानि) वज्रास्त्र (नि भ्राशयन्) निरन्तर ज्वलित करता हुआ (यातुजूनाम्) यातनाओं-पीड़ाओं को प्रेरित करनेवाले दुष्ट जनों को (अव तनुहि) नीचे गिरा (ते-उग्राय) तुझ प्रतापी राजा के लिये (सहः बलम्) शत्रु के सहन करने योग्य बल को (ददामि) मैं पुरोहित या शिक्षक देता हूँ (विगदेषु) आह्वानप्रसङ्गों में-संग्रामों में (शत्रून्) शत्रुओं को प्रतीत्य सामने जाकर (वृश्च) छिन्न-भिन्न कर ॥५॥
भावार्थभाषाः - राजा सङ्ग्राम में जलते हुए दृढ़ वज्रास्त्रों को निरन्तर चलावे, पीड़ा देनेवाले शत्रुओं को नीचे गिरावे। सङ्ग्रामों में शत्रु के सामने डटकर उन्हें छिन्न-भिन्न कर डाले ॥५॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

आयुध - दीपन व शत्रु-व्रश्चन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत मन्त्र के अनुसार सोमरक्षण के द्वारा (तिग्मानि) = खूब तेजस्वितावाले भ्राश्यानि दीप्त आयुधों को 'इन्द्रिय, मन व बुद्धिरूप' साधनों को (निभ्राशयन्) = खूब चमकाता हुआ, दीप्त करता हुआ तू (यातुजूनाम्) = पीड़ा देनेवाले काम-क्रोध-लोभ रूप शत्रुओं के (स्थिरा) = बड़े दृढ़ दुर्गों को (अवतनुहि) = क्षीण कर दे [to loosen, undo ] । काम इन्द्रियों में कितना ही दृढ़ दुर्ग बनाया हुआ है। क्रोध ने मन में और लोभ ने बुद्धि में अपना किला बनाया है। सोमपान करनेवाला उपासक अपने आयुधों को तीव्र व दीप्त करके इन किलों को तोड़ डालता है। [२] इस सोमपान करनेवाले उपासक से प्रभु कहते हैं कि (उग्राय ते) = तुझ उदात्तवृत्तिवाले के लिए (सहः बलम्) = शत्रुओं के कुचल देनेवाले बल को (ददामि) = देता हूँ। तू (विगदेषु) = विशिष्ट आह्वान प्रत्याह्वान के शब्दोंवाले युद्धों प्रतीत्या शत्रुओं के प्रति जाकर वृश्च शत्रुओं का छेदन करनेवाला बन । में शत्रून् = व दीप्त बनाएँ, अध्यात्म संग्रामों में शत्रुओं का
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम इन्द्रियों, मन व बुद्धि को तीव्र व्रश्चन करनेवाले बनें।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (भ्राश्यानि स्थिरा तिग्मानि नि भ्राशयन्) ज्वलनीयानि स्थिराणि वज्रास्त्राणि “तिग्मं वज्रनाम” [निघ० २।२०] निरन्तरं ज्वलयन् “भ्राशते ज्वलतिकर्मा” [निघ० १।१६] (यातुजूनाम्) यातुजून् “द्वितीयास्थाने षष्ठी व्यत्ययेन” यातनानां प्रेरयितॄन् दुष्टान् जनान् रोगान् वा (अव तनुहि) अवतानय पातय (ते-उग्राय) तुभ्यं प्रतापिने (सहः-बलं ददामि) शत्रुसहनयोग्यं बलमहं पुरोहितः शिक्षको वा प्रयच्छामि (विगदेषु) आह्वानप्रसङ्गेषु (शत्रून् प्रतीत्य वृश्च) प्रतिगत्य शत्रून् छेदय ॥५॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, lord of solar power, sharpening your catalysis and shining your blazing radiations, reduce and destroy the strong persistent life destroying forces from nature and society. I offer you power and persistent forces of resistance to cooperate with your blazing fight against the anti-life elements. Face the enemies and uproot them in our battle for health and the good life.