सोमपान से 'समृद्धि व सौभाग्य'
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अस्य) = इस (क्षुमत:) = [क्षु = food] हविरूप अन्नवाले, अर्थात् जिसका उत्पादन दानपूर्वक अदन से ही हुआ है [ हु दानाद नयोः], उस (प्रस्थितस्य) = शरीर में विशेषरूप से स्थित सोमस्य सोम का, वीर्यशक्ति का हे (इन्द्र) = जितेन्द्रिय पुरुष ! (पिब) = तू पान कर। (आ सुतस्य) = जो सोम सब ओर उत्पन्न किया जाता है उस सोम के (वरम्) = वरणीय भाग को तू पीनेवाला बन। यह सोम तो सचमुच वरणीय ही वरणीय है । [२] इस सोम को शरीर में ही व्याप्त करने से (स्वस्तिदा:) = यह कल्याण का देनेवाला होता है। इसका पान करके तू (मनसा मादयस्व) = मन से आनन्द का अनुभव कर । सोमरक्षण से जीवन उल्लासमय बनता है । (अर्वाचीनः) = [अर्वाङ् अञ्चति] शरीर के अन्दर ही गति करनेवाला यह सोम (रेवते) = ऐश्वर्यौवाले (सौभगाय) = सौभाग्य के लिए होता है। अर्थात् सोमरक्षण मनुष्य को ऐश्वर्य प्राप्ति के योग्य तथा सौभाग्यशाली बनाता है, इस सोमपान करनेवाले का जीवन [place, planty of prospeity] समृद्धि व सौभाग्यवाला होता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम सोम का रक्षण करें। यह हमें कल्याण को प्राप्त करायेगा और हमारे जीवन की समृद्धि, सौभाग्य-सम्पन्न बनाएगा ।