पदार्थान्वयभाषाः - [१] (कः) = वे आनन्दमय (धीरः) = ज्ञान में रमण करनेवाले प्रभु ही सृष्टि के प्रारम्भ में (छन्दसाम्) = इन पाप निवारक वेदवाणियों के (योगम्) = सम्पर्क को आवेद प्राप्त कराते हैं। 'अग्नि, वायु, आदित्य व अंगिरा' के हृदयों में प्रभु ही इस वेदवाणी का प्रकाश करते हैं। [२] (कः) = वे आनन्दमय प्रभु ही (धिष्ण्यां वाचम्) = [धिषणया कृतां, 'बुद्धिपूर्वा वाक्यकृतिर्वेदे'] बुद्धिपूर्वक वाक्य रचनावाली इस वेदवाणी को (प्रतिपपाद) = प्रतिपादित करते हैं। [३] मानव शरीरों में मन के द्वारा चलाए जानेवाले सप्त होताओंवाले यज्ञ में ['येन यज्ञस्तायते सप्त होता'], सात होता। 'कर्णाविमौ नासिके चक्षणी मुखम्' (कम्) = उस आनन्दमय प्रभु को ही (ऋत्विजाम्) = ऋत्विजों में (अष्टमम्) = आठवाँ (शूरम्) = शूरवीर (आहुः) = कहते हैं । वस्तुत: ये प्रभु ही आठवें ऋत्विज् के रूप में यज्ञ का रक्षण करते हैं । [४] (कः स्वित्) = वे आनन्दमय प्रभु ही (इन्द्रस्य) = इन इन्द्रियों के अधिष्ठाता जीव के (हरी) = ज्ञानेन्द्रिय व कर्मेन्द्रियरूप अश्वों को (निचिकाय) = निश्चय से बनाते हैं [चि-चिनना-बनाना] । वस्तुतः ये इन्द्रियाश्व कितनी ही अद्भुत रचनावाले हैं। अपनी अद्भुत रचना से ये अश्व उस प्रभु की महिमा को व्यक्त करते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु ही ज्ञान देते हैं, वेदवाणी का उपदेश करते हैं। यज्ञों के पालक भी वे प्रभु हैं, प्रभु ही हमें इन्द्रियाश्वों को प्राप्त कराते हैं ।