पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अत्र) = यहाँ इस मानव जीवन में (विरप्शिन:) = प्रभु के नामों का उच्चारण करनेवाले (ऋघायतः) = काम आदि शत्रुओं का हिंसन करते हुए (इन्द्रस्य) = जितेन्द्रिय पुरुष के (तविषीभ्यः) = बलों से इसकी इन्द्रियाँ (मन्यवे) = ज्ञान प्राप्ति के लिए (अरंहयन्त) = वेगवाली होती हैं। जब हम जितेन्द्रिय बनते हैं, प्रभु का स्मरण करते हैं और काम आदि का संहार करने के लिए यत्नशील होते हैं तो हमारी इन्द्रियाँ ज्ञान प्राप्ति में प्रवृत्त होती हैं । [३] यह होता तभी है (यद्) = जब कि (उग्रः) = एक तेजस्वी पुरुष (ओजसा) = ओजस्विता से (वृत्रम्) = वासना को (व्यवृश्चत्) = काट डालता है, छिन्न-भिन्न कर देता है । उस वासना को, जो कि (अपः बिभ्रतम्) = [भृ=take away] हमारे रेत: कणों को हमारे से दूर ले जाती है तथा (तमसा परीवृतम्) = अन्धकार से आवृत है । वासना के कारण शक्ति नष्ट होती है, अज्ञानान्धकार बढ़ता है। इस ज्ञान की आवरणभूत वृत्र नामक वासना को जब हम नष्ट करते हैं तो हमारी इन्द्रियाँ ज्ञान प्राप्ति के लिए वेग से आगे बढ़ती हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम वासना का विनाश करके ज्ञान प्राप्ति के लिए अग्रसर हों ।