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तम॑स्य॒ विष्णु॑र्महि॒मान॒मोज॑सां॒शुं द॑ध॒न्वान्मधु॑नो॒ वि र॑प्शते । दे॒वेभि॒रिन्द्रो॑ म॒घवा॑ स॒याव॑भिर्वृ॒त्रं ज॑घ॒न्वाँ अ॑भव॒द्वरे॑ण्यः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tam asya viṣṇur mahimānam ojasāṁśuṁ dadhanvān madhuno vi rapśate | devebhir indro maghavā sayāvabhir vṛtraṁ jaghanvām̐ abhavad vareṇyaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

तम् । अ॒स्य॒ । विष्णुः॑ । म॒हि॒मान॑म् । ओज॑सा । अं॒शुम् । द॒ध॒न्वान् । मधु॑नः । वि । र॒प्श॒ते॒ । दे॒वेभिः॑ । इन्द्रः॑ । म॒घऽवा॑ । स॒याव॑ऽभिः । वृ॒त्रम् । ज॒घ॒न्वान् । अ॒भ॒व॒त् । वरे॑ण्यः ॥ १०.११३.२

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:113» मन्त्र:2 | अष्टक:8» अध्याय:6» वर्ग:14» मन्त्र:2 | मण्डल:10» अनुवाक:10» मन्त्र:2


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अस्य मधुनः) इस मधुर सुखद राष्ट्र ऐश्वर्य के (अंशुं दधन्वान्) संविभागरूप राजपद को प्राप्त-करता हुआ (विष्णुः) सब राजगुणों में व्याप्त राजा (तं महिमानम्) उसके उस महत्त्व स्वरूप को (ओजसा) स्वबल से (वि रप्शते) विशेषरूप से प्रकाशित करता है-प्रसिद्ध करता है (मघवा-इन्द्रः) वह ऐश्वर्यवान् राजा (सयावभिः) साथ जानेवाले (देवेभिः) युद्ध जीतने की इच्छा रखनेवाले सैनिकों के साथ (वृत्रम्) आवरक आक्रमणकारी शत्रु को (जघन्वान्) मारता है (वरेण्यः-अभवत्) वह ऐसा राजा वरणीय-निर्वाचन में स्वीकार करने योग्य होता है ॥२॥
भावार्थभाषाः - मधुर, सुखप्रद राष्ट्र के राजपद को प्राप्त करके राजा उसे अपने बल से उन्नत करता है और युद्ध को जीतने की इच्छा रखनेवाले सैनिकों के साथ युद्ध में जाकर शत्रु का हनन कर सकता है, ऐसा व्यक्ति राजा बनने के योग्य है ॥२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

महिमा - ओजस् - अंशु

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (विष्णुः) = सर्वव्यापक प्रभु (अस्य) = गत मन्त्र के अनुसार इस सोमपान करनेवाले के (महिमानम्) = पूजन के भाव को तथा (ओजसा) = ओजस्विता के साथ (अंशुम्) = प्रकाश की किरणों को (दधन्वान्) = धारण करता हुआ (मधुनः) = अत्यन्त माधुर्य से (विरप्शते) = ज्ञान का प्रतिपादन करता है । जब एक व्यक्ति सोम का रक्षण करता है तो उसके हृदय में पूजा का भाव होता है, शरीर में शक्ति तथा मस्तिष्क में ज्ञान की किरणें । हृदयस्थ प्रभु इसके लिए अत्यन्त मधुरता से ज्ञान का उपदेश करते हैं। [२] (इन्द्रः) = वे शक्तिशाली प्रभु, (मघवा) = सम्पूर्ण ऐश्वर्यों के स्वामी प्रभु (सयावभिः) = साथ-साथ प्राप्त होनेवाले (देवेभिः) = दिव्यगुणों के द्वारा (वृत्रम्) = ज्ञान की आवरणभूत वासना को (जघन्वान्) = नष्ट करते हैं और अतएव (वरेण्यः) = वरने योग्य (अभवत्) = होते हैं । हम प्रभु का वरण व सम्भजन करते हैं तो प्रभु हमारे लिए वृत्र को विनष्ट करके सब दिव्यगुणों को प्राप्त कराते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु हमारे हृदयों में पूजाभाव को, शरीर में शक्ति को व मस्तिष्क में प्रकाश को प्राप्त कराते हैं।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अस्य मधुनः-अंशुं दधन्वान्) अस्य मधुरसुखदस्य राष्ट्रैश्वर्यस्य संविभागं राजापदं प्राप्नुवन् “दधन्वान् धरन्” [यजु० १९।२] (विष्णुः) सर्वराजगुणेषु व्याप्तः “विष्णुः सर्वगुणेषु व्यापनशीलः” [ऋ० १।९।९ दयानन्दः] इन्द्रो राजा (तं महिमानम्-ओजसा-वि रप्शते) तस्य तं महत्त्वं स्वरूपं स्वबलेन विशिष्टं राजते प्रकाशयति प्रसिद्धं करोति यशस्विनं करोति “रप्शते विशेषेण राजते” [ऋ० ४।४५।१ दयानन्दः] (मघवा-इन्द्रः) स ऐश्वर्यवान् राजा (सयावभिः-देवेभिः) सह गन्तृभिर्युद्धं विजिगीषुभिः सैनिकैः “सयावभिः-ये सह यान्ति तैः” [यजु० ३३।१५] (वृत्रं जघन्वान्) आवरकमाक्रमणकारिणं शत्रुं हन्ति (वरेण्यः-अभवत्) स राजा वरणीयः निर्वाचने स्वीकार्यः भवति ॥२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Vishnu, pervasive power and presence of nature and humanity, holding, sharing and sustaining its own part of the power and Dharma of Indra’s dominion by virtue of its own might and lustre, exlalts the sweetness and grace of his system, and Indra, ruler of the glorious dominion, destroying the evil factors of darkness, want and ignorance with the assistance of his supporters and divine partners rises mightier, proves his greatness and majesty and becomes the object of his devotees’ choice all the more.