वांछित मन्त्र चुनें

नि षु सी॑द गणपते ग॒णेषु॒ त्वामा॑हु॒र्विप्र॑तमं कवी॒नाम् । न ऋ॒ते त्वत्क्रि॑यते॒ किं च॒नारे म॒हाम॒र्कं म॑घवञ्चि॒त्रम॑र्च ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ni ṣu sīda gaṇapate gaṇeṣu tvām āhur vipratamaṁ kavīnām | na ṛte tvat kriyate kiṁ canāre mahām arkam maghavañ citram arca ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

नि । सु । सी॒द॒ । ग॒ण॒ऽप॒ते॒ । ग॒णेषु॑ । त्वाम् । आ॒हुः॒ । विप्र॑ऽतमम् । क॒वी॒नाम् । न । ऋ॒ते । त्वत् । क्रि॒य॒ते॒ । किम् । च॒न । आ॒रे । म॒हाम् । अ॒र्कम् । म॒घ॒ऽव॒न् । चि॒त्रम् । अ॒र्च॒ ॥ १०.११२.९

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:112» मन्त्र:9 | अष्टक:8» अध्याय:6» वर्ग:13» मन्त्र:4 | मण्डल:10» अनुवाक:9» मन्त्र:9


0 बार पढ़ा गया

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (गणपते) हे स्तोता, प्रार्थी, उपासक, जनगणों के पालक ! (गणेषु) गणों के मध्य (सु निसीद) सुष्ठु निविष्ट हो-नितरां प्रविष्ट हो (कवीनाम्) मेधावियों के मध्य में (विप्रतमम्) अत्यन्त मेधावी (त्वाम्) तुझे (आहुः) कहते हैं (त्वत्-ऋते) तेरे बिना (आरे) दूर या निकट में (किञ्चन) कुछ भी कर्म (न क्रियते) नहीं किया जाता है, (मघवन्) हे अध्यात्मधनवन् ! तेरे लिये (महाम्) महान् (चित्रम्) चायनीय-प्रशंसनीय (अर्कम्) अर्चनीय मन्त्र (अर्च) समर्पित करता हूँ ॥९॥
भावार्थभाषाः - स्तोता प्रार्थी और उपासक जनों का पालक परमात्मा है, वह उनके अन्दर साक्षात् होता है, समस्त मेधावी विद्वानों को मेधा देनेवाला है, उसके बिना दूर या निकट कोई कर्म नहीं होता, वह कर्माध्यक्ष है, उसके लिये महान् प्रशस्त विचार समर्पित करना चाहिये ॥९॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

विघ्नहर्ता 'गणेश'

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (गणपते) = गणों के स्वामिन्! शरीर जिन पञ्चभूतों से बना है यह भूतपंचक प्रथम गण है। इसमें 'प्राण, अपान, व्यान, समान, उदान' नामक पाँच प्राणों का गण है । पाँच कर्मेन्द्रियों का तृतीय गण है, पाँच ज्ञानेन्द्रियों का चौथा । 'मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार तथा हृदय' यह अन्तःकरण पंचक पाँचवा गण है। इन सब गणों के पति वे प्रभु 'गणपति' हैं। इन से प्रार्थना करते हैं कि आप (गणेषु) = हमारे इन गणों में (सुनिसीद) = अच्छी प्रकार आसीन होइये । (त्वाम्) = आपको ही (कवीनाम्) = क्रान्तदर्शी ज्ञानियों का (विप्रतमम्) = सर्वोत्कृष्ट ज्ञानी (आहुः) = करते हैं । ज्ञानियों को ज्ञान देनेवाले वे प्रभु ही हैं। यह ज्ञान उन्हीं को प्राप्त होता है, जो अपने गणों में गणपति को आसीन करते हैं। गणपति के आसीन होने पर आसुर वृत्तियों के आक्रमणरूप विघ्न हो ही नहीं पाते और हमारा जीवनयज्ञ निर्विघ्न पूर्ण होता है । [२] हे प्रभो ! (त्वत् ऋते) = आपके बिना (आरे) [आराद् दूर समीपयोः ] = दूर व पास कहीं भी (किञ्चन) = कुछ भी न क्रियते नहीं किया जाता। आपकी शक्ति से शक्ति सम्पन्न होकर ही हम सब काम कर पाते हैं। हे (मघवन्) = ज्ञानैश्वर्य सम्पन्न प्रभो! आप (महाम्) = अत्यन्त महनीय अर्कम् ज्ञान की रश्मि रूप वेदवाणी को (चित्रम्) = अद्भुत रूप से (अर्च) = दीप्त करिये [ अर्च to shire ] । इस ज्ञान के द्वारा ही तो आप हमें कर्म करने योग्य बनाते हैं। ज्ञान के द्वारा ही हम निर्विघ्नरूप से कर्मों को कर पाते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- गणपति का हम आराधन करें। वे ही हमें ज्ञान देंगे और कर्मों को सिद्ध करने की शक्ति प्राप्त कराएँगे ।
0 बार पढ़ा गया

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (गणपते) हे उपासक प्रार्थि स्तोतॄणां गणानां पालक ! (गणेषु) गणानां मध्ये (सु नि-सीद) सुष्ठु निविशस्व (कवीनां त्वां विप्रतमम्-आहुः) कविषु मेधाविषु खल्वतिशयेन मेधाविनं त्वां कथयन्ति (त्वत्-ऋते-किञ्चन-आरे न क्रियते) त्वया विना निकटे किंवा दूरे किमपि कर्म न क्रियते (मघवन्) ऐश्वर्यवन् ! (महाम्-अर्कम्-चित्रम्-अर्च) तुभ्यं महान्तमर्चनीयं मन्त्रं चित्रं चायनीयमर्चयामि समर्पयामि ‘पुरुषव्यत्ययेन मध्यम उत्तमस्थाने ॥९॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O lord of the people, stay and abide with the people, they celebrate you as the highest incomparable of the poets of the world of existence. Nothing happens, nothing is done without you far or near. O lord of glory, I offer you the highest and most wonderful tribute and homage and adoration.