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इ॒दं ते॒ पात्रं॒ सन॑वित्तमिन्द्र॒ पिबा॒ सोम॑मे॒ना श॑तक्रतो । पू॒र्ण आ॑हा॒वो म॑दि॒रस्य॒ मध्वो॒ यं विश्व॒ इद॑भि॒हर्य॑न्ति दे॒वाः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

idaṁ te pātraṁ sanavittam indra pibā somam enā śatakrato | pūrṇa āhāvo madirasya madhvo yaṁ viśva id abhiharyanti devāḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

इ॒दम् । ते॒ । पात्र॑म् । सन॑ऽवित्तम् । इ॒न्द्र॒ । पिब॑ । सोम॑म् । ए॒ना । श॒त॒क्र॒तो॒ इति॑ शतऽक्रतो । पू॒र्णः । आ॒ऽहा॒वः । म॒दि॒रस्य॑ । मध्वः॑ । यम् । विश्वे॑ । इत् । अ॒भि॒ऽहर्य॑न्ति । दे॒वाः ॥ १०.११२.६

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:112» मन्त्र:6 | अष्टक:8» अध्याय:6» वर्ग:13» मन्त्र:1 | मण्डल:10» अनुवाक:9» मन्त्र:6


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्र) हे ऐश्वर्यवन् परमात्मन् ! (ते) तेरे लिये (इदं पात्रम्) यह पानस्थान हृदय (सनवित्तम्) सनातन-सदा से प्राप्त है (शतक्रतो) हे बहुत कृपा करनेवाले-दया बुद्धिवाले (एना) इससे (सोमम्) उपासनारस को (पिब) ग्रहण कर-स्वीकार कर (मदिरस्य) हर्षकारी (मध्वः) मधुर का (पूर्णः) पूर्ण (आहावः) पानाशय-पीने का स्थान है (यम्) जिसको (विश्वेदेवाः) सब उपासक, विद्वान् (इत्-अभिहर्यन्ति) तेरे पीने को देने की इच्छा करते हैं ॥६॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा बहुत कृपा करनेवाला है, उसे अपने उपासनारस को समर्पित करने के लिये हृदय में आह्वान करना चाहिये-बुलाना चाहिये, हृदय ही उसके उपासनारस के पान करने का स्थान है ॥६॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

मदिर मधु से परिपूर्ण 'आहाव'

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (इन्द्र) = जितेन्द्रिय पुरुष ! (इदम्) = गत मन्त्र में वर्णित यह (ते) = तेरा (पात्रम्) = शरीररूप पात्र (सनवित्तम्) = सनातन धनवाला हो। 'सोम' ही इसका सनातन धन है। शरीर का रक्षण धारण वर्धन सब इस सोम पर ही निर्भर करता है। हे शतक्रतो ! शतवर्ष पर्यन्त ज्ञान व शक्तिवाले जीव ! तू (एना) = इस शरीररूप पात्र से (सोमं पिबा) = सोम का पान कर। यह सोम ही तो तेरा वास्तविक धन है । [२] तेरा यह शरीर (आहाव:) = निपान हो [ tough], वह द्रोण पात्र हो जो (मदिरस्य) = आनन्द के जनक (मध्वः) = अत्यन्त मधुर इस सोम से (पूर्णः) = भरा हुआ हो । यही मदिर मधु से परिपूर्ण आहाव वह है (यं अभि) = जिसकी ओर (इत्) = निश्चय से (विश्वे देवाः) = सब देव (अभिहर्यन्ति) = आने की कामना करता है। शरीर को हम सोम से परिपूर्ण आहाव बनाएँ तो हमें सब दिव्यगुण अवश्य प्राप्त होंगे। हमारा यह शरीर देवों का निवास स्थान बन जाएगा।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोम [वीर्य] ही इस शरीर का सनातन धन है। शरीर में सोम का रक्षण होने पर यहाँ सब दिव्यगुणों का वास होता है। यह शरीर हमारा वह आहाव [द्रोण पात्र] हो जो मदिर मधु से परिपूर्ण हो, जिसका पान करने के लिए सब देव यहाँ आएँ ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्र) हे ऐश्वर्यवन् परमात्मन् ! (ते-इदं-पात्रं सनवित्तम्) तुभ्यमिदं पानस्थानं हृदयं सनात् सदातनात् प्राप्तमस्ति (शतक्रतो पिब एना सोमम्) हे बहुकृपाकर्मवन् दयाबुद्धिमन् ! एतेनोपासनारसं पिब गृहाण स्वीकुरु (मदिरस्य-मध्वः पूर्णः-आहावः) हर्षकरस्य मधुरस्य पूर्णः पानाशयोऽस्ति (यं विश्वे देवाः-इत्-अभिहर्यन्ति) यं सर्वे देवा-उपासका हि तव पानाय दातुं कामयन्ते ॥६॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, lord of infinite action, this heart and soul is ever dedicated to you, pray accept and enjoy the love and homage presented by the celebrant. Over flowing is the heart and soul with ecstatic joy and honey sweets of devotion which all divinities of heaven and earth love and cherish.