मदिर मधु से परिपूर्ण 'आहाव'
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (इन्द्र) = जितेन्द्रिय पुरुष ! (इदम्) = गत मन्त्र में वर्णित यह (ते) = तेरा (पात्रम्) = शरीररूप पात्र (सनवित्तम्) = सनातन धनवाला हो। 'सोम' ही इसका सनातन धन है। शरीर का रक्षण धारण वर्धन सब इस सोम पर ही निर्भर करता है। हे शतक्रतो ! शतवर्ष पर्यन्त ज्ञान व शक्तिवाले जीव ! तू (एना) = इस शरीररूप पात्र से (सोमं पिबा) = सोम का पान कर। यह सोम ही तो तेरा वास्तविक धन है । [२] तेरा यह शरीर (आहाव:) = निपान हो [ tough], वह द्रोण पात्र हो जो (मदिरस्य) = आनन्द के जनक (मध्वः) = अत्यन्त मधुर इस सोम से (पूर्णः) = भरा हुआ हो । यही मदिर मधु से परिपूर्ण आहाव वह है (यं अभि) = जिसकी ओर (इत्) = निश्चय से (विश्वे देवाः) = सब देव (अभिहर्यन्ति) = आने की कामना करता है। शरीर को हम सोम से परिपूर्ण आहाव बनाएँ तो हमें सब दिव्यगुण अवश्य प्राप्त होंगे। हमारा यह शरीर देवों का निवास स्थान बन जाएगा।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोम [वीर्य] ही इस शरीर का सनातन धन है। शरीर में सोम का रक्षण होने पर यहाँ सब दिव्यगुणों का वास होता है। यह शरीर हमारा वह आहाव [द्रोण पात्र] हो जो मदिर मधु से परिपूर्ण हो, जिसका पान करने के लिए सब देव यहाँ आएँ ।